aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zabaan"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरेबोल ज़बाँ अब तक तेरी हैतेरा सुत्वाँ जिस्म है तेराबोल कि जाँ अब तक तेरी हैदेख कि आहन-गर की दुकाँ मेंतुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहनखुलने लगे क़ुफ़्लों के दहानेफैला हर इक ज़ंजीर का दामनबोल ये थोड़ा वक़्त बहुत हैजिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहलेबोल कि सच ज़िंदा है अब तकबोल जो कुछ कहना है कह ले
ज़िंदगी से डरते हो!ज़िंदगी तो तुम भी हो ज़िंदगी तो हम भी हैं!ज़िंदगी से डरते हो?आदमी से डरते होआदमी तो तुम भी हो आदमी तो हम भी हैंआदमी ज़बाँ भी है आदमी बयाँ भी हैउस से तुम नहीं डरते!हर्फ़ और मअनी के रिश्ता-हा-ए-आहन से आदमी है वाबस्ताआदमी के दामन से ज़िंदगी है वाबस्ताउस से तुम नहीं डरते''अन-कही'' से डरते होजो अभी नहीं आई उस घड़ी से डरते होउस घड़ी की आमद की आगही से डरते हो
तुम्हारी तर्बियत में मेरा हिस्सा कम रहा कम-तरज़बाँ मेरी तुम्हारे वास्ते शायद कि मुश्किल होज़बाँ अपनी ज़बाँ मैं तुम को आख़िर कब सिखा पायाअज़ाब-ए-सद-शमातत आख़िरश मुझ पर ही नाज़िल होज़बाँ का काम यूँ भी बात समझाना नहीं होतासमझ में कोई भी मतलब कभी आना नहीं होताकभी ख़ुद तक भी मतलब कोई पहुंचाना नहीं होतागुमानों के गुमाँ की दम-ब-दम आशोब-कारी हैभला क्या ए'तिबारी और क्या ना-ए'तिबारी है
मिरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों कीमिरा क़लम तो अदालत मिरे ज़मीर की हैइसी लिए तो जो लिक्खा तपाक-ए-जाँ से लिखाजभी तो लोच कमाँ का ज़बान तीर की है
हक़ीक़त हुई जैसे मुझ पर अयाँक़लम बन गया है ख़ुदा की ज़बाँ
जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैंगिलासों ने उन्हें मतरूक कर डालाज़बाँ पर ज़ाइक़ा आता था जो सफ़्हे पलटने काअब उँगली क्लिक करने से बस इकझपकी गुज़रती हैबहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है पर्दे पर
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
जब से चमन छुटा है ये हाल हो गया हैदिल ग़म को खा रहा है ग़म दिल को खा रहा हैगाना इसे समझ कर ख़ुश हों न सुनने वालेदुखते हुए दिलों की फ़रियाद ये सदा हैआज़ाद मुझ को कर दे ओ क़ैद करने वालेमैं बे-ज़बाँ हूँ क़ैदी तू छोड़ कर दुआ ले!
ज़बान ख़ुश्क है आवाज़ रुकती जाती हैतसव्वुरात की परछाइयाँ उभरती हैं
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
ये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ कामज़ा घुलता है लफ़्ज़ों का ज़बाँ परकि जैसे पान में महँगा क़िमाम घुलता हैये कैसा इश्क़ है उर्दू ज़बाँ का....नशा आता है उर्दू बोलने मेंगिलौरी की तरह हैं मुँह लगी सब इस्तेलाहेंलुत्फ़ देती है, हलक़ छूती है उर्दू तो, हलक़ से जैसे मय का घोंट उतरता हैबड़ी अरिस्टोकरेसी है ज़बाँ मेंफ़क़ीरी में नवाबी का मज़ा देती है उर्दूअगरचे मअनी कम होते है उर्दू मेंअल्फ़ाज़ की इफ़रात होती हैमगर फिर भी, बुलंद आवाज़ पढ़िए तो बहुत ही मो'तबर लगती हैं बातेंकहीं कुछ दूर से कानों में पड़ती है अगर उर्दूतो लगता है कि दिन जाड़ों के हैं खिड़की खुली है, धूप अंदर आ रही हैअजब है ये ज़बाँ, उर्दूकभी कहीं सफ़र करते अगर कोई मुसाफ़िर शेर पढ़ दे 'मीर', 'ग़ालिब' कावो चाहे अजनबी हो, यही लगता है वो मेरे वतन का हैबड़ी शाइस्ता लहजे में किसी से उर्दू सुन करक्या नहीं लगता कि एक तहज़ीब की आवाज़ है, उर्दू
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरीख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरीये दस्तूर-ए-ज़बाँ-बंदी है कैसा तेरी महफ़िल मेंयहाँ तो बात करने को तरसती है ज़बाँ मेरीउठाए कुछ वरक़ लाले ने कुछ नर्गिस ने कुछ गुल नेचमन में हर तरफ़ बिखरी हुई है दास्ताँ मेरीउड़ा ली क़ुमरियों ने तूतियों ने अंदलीबों नेचमन वालों ने मिल कर लूट ली तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ मेरीटपक ऐ शम्अ आँसू बन के परवाने की आँखों सेसरापा दर्द हूँ हसरत भरी है दास्ताँ मेरीइलाही फिर मज़ा क्या है यहाँ दुनिया में रहने काहयात-ए-जावेदाँ मेरी न मर्ग-ए-ना-गहाँ मेरीमिरा रोना नहीं रोना है ये सारे गुलिस्ताँ कावो गुल हूँ मैं ख़िज़ाँ हर गुल की है गोया ख़िज़ाँ मेरीदरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारमज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारमरियाज़-ए-दहर में ना-आश्ना-ए-बज़्म-ए-इशरत हूँख़ुशी रोती है जिस को मैं वो महरूम-ए-मसर्रत हूँमिरी बिगड़ी हुई तक़दीर को रोती है गोयाईमैं हर्फ़-ए-ज़ेर-ए-लब शर्मिंदा-ए-गोश-ए-समाअत हूँपरेशाँ हूँ मैं मुश्त-ए-ख़ाक लेकिन कुछ नहीं खुलतासिकंदर हूँ कि आईना हूँ या गर्द-ए-कुदूरत हूँये सब कुछ है मगर हस्ती मिरी मक़्सद है क़ुदरत कासरापा नूर हो जिस की हक़ीक़त मैं वो ज़ुल्मत हूँख़ज़ीना हूँ छुपाया मुझ को मुश्त-ए-ख़ाक-ए-सहरा नेकिसी को क्या ख़बर है मैं कहाँ हूँ किस की दौलत हूँनज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए-हस्तीमैं वो छोटी सी दुनिया हूँ कि आप अपनी विलायत हूँन सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमानामैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँमुझे राज़-ए-दो-आलम दिल का आईना दिखाता हैवही कहता हूँ जो कुछ सामने आँखों के आता हैअता ऐसा बयाँ मुझ को हुआ रंगीं-बयानों मेंकि बाम-ए-अर्श के ताइर हैं मेरे हम-ज़बानों मेंअसर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ कामिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों मेंरुलाता है तिरा नज़्ज़ारा ऐ हिन्दोस्ताँ मुझ कोकि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों मेंदिया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दिया गोयालिखा कल्क-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहा-ख़्वानों मेंनिशान-ए-बर्ग-ए-गुल तक भी न छोड़ उस बाग़ में गुलचींतिरी क़िस्मत से रज़्म-आराइयाँ हैं बाग़बानों मेंछुपा कर आस्तीं में बिजलियाँ रक्खी हैं गर्दूं नेअनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशियानों मेंसुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी ये ऐसी चीज़ है जिस कोवज़ीफ़ा जान कर पढ़ते हैं ताइर बोस्तानों मेंवतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली हैतिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों मेंज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है होने वाला हैधरा क्या है भला अहद-ए-कुहन की दास्तानों मेंये ख़ामोशी कहाँ तक लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा करज़मीं पर तू हो और तेरी सदा हो आसमानों मेंन समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्ताँ वालोतुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों मेंयही आईन-ए-क़ुदरत है यही उस्लूब-ए-फ़ितरत हैजो है राह-ए-अमल में गामज़न महबूब-ए-फ़ितरत हैहुवैदा आज अपने ज़ख़्म-ए-पिन्हाँ कर के छोड़ूँगालहू रो रो के महफ़िल को गुलिस्ताँ कर के छोड़ूँगाजलाना है मुझे हर शम-ए-दिल को सोज़-ए-पिन्हाँ सेतिरी तारीक रातों में चराग़ाँ कर के छोड़ूँगामगर ग़ुंचों की सूरत हूँ दिल-ए-दर्द-आश्ना पैदाचमन में मुश्त-ए-ख़ाक अपनी परेशाँ कर के छोड़ूँगापिरोना एक ही तस्बीह में इन बिखरे दानों कोजो मुश्किल है तो इस मुश्किल को आसाँ कर के छोड़ूँगामुझे ऐ हम-नशीं रहने दे शग़्ल-ए-सीना-कावी मेंकि मैं दाग़-ए-मोहब्बत को नुमायाँ कर के छोड़ूँगादिखा दूँगा जहाँ को जो मिरी आँखों ने देखा हैतुझे भी सूरत-ए-आईना हैराँ कर के छोड़ूँगाजो है पर्दों में पिन्हाँ चश्म-ए-बीना देख लेती हैज़माने की तबीअत का तक़ाज़ा देख लेती हैकिया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आश्ना तू नेगुज़ारी उम्र पस्ती में मिसाल-ए-नक़्श-ए-पा तू नेरहा दिल-बस्ता-ए-महफ़िल मगर अपनी निगाहों कोकिया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत-आश्ना तू नेफ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं परमगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू नेतअस्सुब छोड़ नादाँ दहर के आईना-ख़ाने मेंये तस्वीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तू नेसरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जासपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू नेसफ़ा-ए-दिल को क्या आराइश-ए-रंग-ए-तअल्लुक़ सेकफ़-ए-आईना पर बाँधी है ओ नादाँ हिना तू नेज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू नेज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिलबनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू नेकुएँ में तू ने यूसुफ़ को जो देखा भी तो क्या देखाअरे ग़ाफ़िल जो मुतलक़ था मुक़य्यद कर दिया तू नेहवस बाला-ए-मिम्बर है तुझे रंगीं-बयानी कीनसीहत भी तिरी सूरत है इक अफ़्साना-ख़्वानी कीदिखा वो हुस्न-ए-आलम-सोज़ अपनी चश्म-ए-पुर-नम कोजो तड़पाता है परवाने को रुलवाता है शबनम कोज़रा नज़्ज़ारा ही ऐ बुल-हवस मक़्सद नहीं उस काबनाया है किसी ने कुछ समझ कर चश्म-ए-आदम कोअगर देखा भी उस ने सारे आलम को तो क्या देखानज़र आई न कुछ अपनी हक़ीक़त जाम से जम कोशजर है फ़िरक़ा-आराई तअस्सुब है समर उस काये वो फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम कोन उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भीये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम कोफिरा करते नहीं मजरूह-ए-उल्फ़त फ़िक्र-ए-दरमाँ मेंये ज़ख़्मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम कोमोहब्बत के शरर से दिल सरापा नूर होता हैज़रा से बीज से पैदा रियाज़-ए-तूर होता हैदवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए-आरज़ू रहनाइलाज-ए-ज़ख़्म है आज़ाद-ए-एहसान-ए-रफ़ू रहनाशराब-ए-बे-ख़ुदी से ता-फ़लक परवाज़ है मेरीशिकस्त-ए-रंग से सीखा है मैं ने बन के बू रहनाथमे क्या दीदा-ए-गिर्यां वतन की नौहा-ख़्वानी मेंइबादत चश्म-ए-शाइर की है हर दम बा-वज़ू रहनाबनाएँ क्या समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशियाँ अपनाचमन में आह क्या रहना जो हो बे-आबरू रहनाजो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत मेंग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहनाये इस्तिग़्ना है पानी में निगूँ रखता है साग़र कोतुझे भी चाहिए मिस्ल-ए-हबाब-ए-आबजू रहनान रह अपनों से बे-परवा इसी में ख़ैर है तेरीअगर मंज़ूर है दुनिया में ओ बेगाना-ख़ू रहनाशराब-ए-रूह-परवर है मोहब्बत नौ-ए-इंसाँ कीसिखाया इस ने मुझ को मस्त बे-जाम-ओ-सुबू रहनामोहब्बत ही से पाई है शिफ़ा बीमार क़ौमों नेकिया है अपने बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता को बेदार क़ौमों नेबयाबान-ए-मोहब्बत दश्त-ए-ग़ुर्बत भी वतन भी हैये वीराना क़फ़स भी आशियाना भी चमन भी हैमोहब्बत ही वो मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भीजरस भी कारवाँ भी राहबर भी राहज़न भी हैमरज़ कहते हैं सब इस को ये है लेकिन मरज़ ऐसाछुपा जिस में इलाज-ए-गर्दिश-ए-चर्ख़-ए-कुहन भी हैजलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जानाये परवाना जो सोज़ाँ हो तो शम-ए-अंजुमन भी हैवही इक हुस्न है लेकिन नज़र आता है हर शय मेंये शीरीं भी है गोया बे-सुतूँ भी कोहकन भी हैउजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईं ने क़ौमों कोमिरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िक्र-ए-वतन भी हैसुकूत-आमोज़ तूल-ए-दास्तान-ए-दर्द है वर्नाज़बाँ भी है हमारे मुँह में और ताब-ए-सुख़न भी हैनमी-गर्दीद को तह रिश्ता-ए-मअ'नी रिहा कर्दमहिकायत बूद बे-पायाँ ब-ख़ामोशी अदा कर्दम
जो मरहलों में साथ थे वो मंज़िलों पे छुट गएजो रात में लुटे न थे वो दोपहर में लुट गएमगन था मैं कि प्यार के बहुत से गीत गाऊँगाज़बान गुंग हो गई, गले में गीत घुट गएकटी हुई हैं उँगलियाँ रुबाब ढूँढता हूँ मैंजिन्हें सहर निगल गई वो ख़्वाब ढूँढता हूँ मैंकहाँ गई वो नींद की शराब ढूँढता हूँ मैं
मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकतासकूँ लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकताकोई नग़्मे तो क्या अब मुझ से मेरा साज़ भी ले लेजो गाना चाहता हूँ आह वो मैं गा नहीं सकतामता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबतमैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकतावो बादल सर पे छाए हैं कि सर से हट नहीं सकतेमिला है दर्द वो दिल को कि दिल से जा नहीं सकताहवस-कारी है जुर्म-ए-ख़ुद-कुशी मेरी शरीअ'त मेंये हद्द-ए-आख़िरी है मैं यहाँ तक जा नहीं सकतान तूफ़ाँ रोक सकते हैं न आँधी रोक सकती हैमगर फिर भी मैं उस क़स्र-ए-हसीं तक जा नहीं सकतावो मुझ को चाहती है और मुझ तक आ नहीं सकतीमैं उस को पूजता हूँ और उस को पा नहीं सकताये मजबूरी सी मजबूरी ये लाचारी सी लाचारीकि उस के गीत भी दिल खोल कर मैं गा नहीं सकताज़बाँ पर बे-ख़ुदी में नाम उस का आ ही जाता हैअगर पूछे कोई ये कौन है बतला नहीं सकताकहाँ तक क़िस्स-ए-आलाम-ए-फ़ुर्क़त मुख़्तसर ये हैयहाँ वो आ नहीं सकती वहाँ मैं जा नहीं सकताहदें वो खींच रक्खी हैं हरम के पासबानों नेकि बिन मुजरिम बने पैग़ाम भी पहुँचा नहीं सकता
जिन शहरों में गूँजी थी ग़ालिब की नवा बरसोंउन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरीआज़ादी-ए-कामिल का एलान हुआ जिस दिनमा'तूब ज़बाँ ठहरी ग़द्दार ज़बाँ ठहरी
मैं ने उस से ये कहाये जो दस करोड़ हैंजहल का निचोड़ हैंउन की फ़िक्र सो गईहर उमीद की किरनज़ुल्मतों में खो गईये ख़बर दुरुस्त हैउन की मौत हो गईबे-शुऊर लोग हैंज़िंदगी का रोग हैंऔर तेरे पास हैउन के दर्द की दवामैं ने उस से ये कहातू ख़ुदा का नूर हैअक़्ल है शुऊर हैक़ौम तेरे साथ हैतेरे ही वजूद सेमुल्क की नजात हैतू है महर-ए-सुब्ह-ए-नौतेरे बाद रात हैबोलते जो चंद हैंसब ये शर-पसंद हैंउन की खींच ले ज़बाँउन का घोंट दे गलामैं ने उस से ये कहाजिन को था ज़बाँ पे नाज़चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़चैन है समाज मेंबे-मिसाल फ़र्क़ हैकल में और आज मेंअपने ख़र्च पर हैं क़ैदलोग तेरे राज मेंआदमी है वो बड़ादर पे जो रहे पड़ाजो पनाह माँग लेउस की बख़्श दे ख़ता
ज़बाँ पर हैं अभी इस्मत ओ तक़्दीस के नग़्मेवो बढ़ जाती है इस दुनिया से अक्सर इस क़दर आगेमिरे तख़्ईल के बाज़ू भी उस को छू नहीं सकतेमुझे हैरान कर देती हैं नुक्ता-दानियाँ उस की
'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' होख़त्म हुआ दोनों का जश्नआओ उन्हें अब कर दें दफ़्नख़त्म करो तहज़ीब की बातबंद करो कल्चर का शोरसत्य अहिंसा सब बकवासहम भी क़ातिल तुम भी चोरख़त्म हुआ दोनों का जश्नआओ उन्हें अब कर दें दफ़्नवो बस्ती वो गाँव ही क्याजिस में हरीजन हो आज़ादवो क़स्बा वो शहर ही क्याजो न बने अहमदाबादख़त्म हुआ दोनों का जश्नआओ उन्हें अब कर दें दफ़्न'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' होदोनों का क्या काम यहाँअब के बरस भी क़त्ल हुईएक की शिकस्ता इक की ज़बाँख़त्म हुआ दोनों का जश्नआओ उन्हें अब कर दें दफ़्न
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
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