aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "zaruurii"
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने मेंज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना होउसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंमदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना होबहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंबदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना होकिसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंकिसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना होहक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना होहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगीयही है दिल का मज़मून अब तुम्हारी उम्र क्या होगीहमारे दरमियाँ अब एक बेजा-तर ज़माना हैलब-ए-तिश्ना पे इक ज़हर-ए-हक़ीक़त का फ़साना हैअजब फ़ुर्सत मयस्सर आई है ''दिल जान रिश्ते'' कोन दिल को आज़माना है न जाँ को आज़माना हैकलीद-ए-किश्त-ज़ार-ए-ख़्वाब भी गुम हो गई आख़िरकहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना हैकहूँ तो क्या कहूँ मेरा ये ज़ख़्म-ए-जावेदाना हैवही दिल की हक़ीक़त जो कभी जाँ थी वो अब आख़िरफ़साना दर फ़साना दर फ़साना दर फ़साना हैहमारा बाहमी रिश्ता जो हासिल-तर था रिश्तों काहमारा तौर-ए-बे-ज़ारी भी कितना वालिहाना हैकिसी का नाम लिक्खा है मिरी सारी बयाज़ों परमैं हिम्मत कर रहा हूँ यानी अब उस को मिटाना है
अगर मैं समझूँके ये जो मोहरे हैंसिर्फ़ लकड़ी के हैं खिलौनेतो जीतना क्या है हारना क्यान ये ज़रूरीन वो अहम हैअगर ख़ुशी है न जीतने कीन हारने का ही कोई ग़म हैतो खेल क्या हैमैं सोचता हूँजो खेलना हैतो अपने दिल में यक़ीन कर लूँये मोहरे सच-मुच के बादशाह ओ वज़ीरसच-मुच के हैं प्यादेऔर इन के आगे हैदुश्मनों की वो फ़ौजरखती है जो कि मुझ को तबाह करने केसारे मंसूबेसब इरादेमगर ऐसा जो मान भी लूँतो सोचता हूँये खेल कब हैये जंग है जिस को जीतना हैये जंग है जिस में सब है जाएज़कोई ये कहता है जैसे मुझ सेये जंग भी हैये खेल भी हैये जंग है पर खिलाड़ियों कीये खेल है जंग की तरह कामैं सोचता हूँजो खेल हैइस में इस तरह का उसूल क्यूँ हैकि कोई मोहरा रहे कि जाएमगर जो है बादशाहउस पर कभी कोई आँच भी न आएवज़ीर ही को है बस इजाज़तकि जिस तरफ़ भी वो चाहे जाए
बरतरी के सुबूत की ख़ातिरख़ूँ बहाना ही क्या ज़रूरी हैघर की तारीकियाँ मिटाने कोघर जलाना ही क्या ज़रूरी है
तुम एक सादा ओ बरजस्ता आदमी ठहरेमिज़ाज-ए-वक़्त को तुम आज तक नहीं समझेजो चीज़ सब से ज़रूरी है वो मैं भूल गईये पासपोर्ट है इस को सँभाल के रखनाजो ये न हो तो ख़ुदा भी बशर तक आ न सकेसो तुम शुऊ'र का अपने कमाल कर रखना
किसी का हुक्म है सारी हवाएँहमेशा चलने से पहले बताएँकि उन की सम्त क्या हैकिधर जा रही हैंहवाओं को बताना ये भी होगाचलेंगी अब तो क्या रफ़्तार होगीहवाओं को ये इजाज़त नहीं हैकि आँधी की इजाज़त अब नहीं हैहमारी रेत की सब ये फ़सीलेंये काग़ज़ के महल जो बन रहे हैंहिफ़ाज़त उन की करना है ज़रूरीऔर आँधी है पुरानी इन की दुश्मनये सभी जनते हैंकिसी का हुक्म है दरिया की लहरेंज़रा ये सर-कशी कम कर लें अपनी हद में ठहरेंउभरना फिर बिखरना और बिखर कर फिर उभरनाग़लत है ये उन का हंगामा करनाये सब है सिर्फ़ वहशत की अलामतबग़ावत की अलामतबग़ावत तो नहीं बर्दाश्त होगीये वहशत तो नहीं बर्दाश्त होगीअगर लहरों को है दरिया में रहनातो उन को होगा अब चुप-चाप बहनाकिसी का हुक्म हैइस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगेकुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगेगुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल कायक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगेमगर ये रंग होगा कितना गहरा कितना हल्काये अफ़सर तय करेंगेकिसी को ये कोई कैसे बताएगुलिस्ताँ में कहीं भी फूल यक-रंगीं नहीं होतेकभी हो ही नहीं सकतेकि हर इक रंग में छुप कर बहुत से रंग रहते हैंजिन्होंने बाग़-ए-यक-रंगीं बनाना चाहे थेउन को ज़रा देखोकि जब इक रंग में सौ रंग ज़ाहिर हो गए हैं तोकितने परेशाँ हैं कितने तंग रहते हैंकिसी को ये कोई कैसे बताएहवाएँ और लहरें कब किसी का हुक्म सुनती हैंहवाएँ हाकिमों की मुट्ठियों में हथकड़ी मेंक़ैद-ख़ानों में नहीं रुकतींये लहरें रोकी जाती हैंतो दरिया कितना भी हो पुर-सुकूँ बेताब होता हैऔर इस बेताबी का अगला क़दम सैलाब होता है
कुछ ऐसा लगता है जिस ने भी डाइरी लिखी हैवो शहर आया है गाँव में छोड़ कर किसी कोतलाश में काम ही के शायद:''मैं शहर की इस मशीन में फ़िट हूँ जैसे ढिबरी,ज़रूरी है ये ज़रा सा पुर्ज़ाअहम भी है क्यूँ कि रोज़ के रोज़ तेल दे करइसे ज़रा और कस के जाता है चीफ़ मेरावो रोज़ कसता है,रोज़ इक पेच और चढ़ता है जब नसों पर,तो जी में आता है ज़हर खा लूँया भाग जाऊँ''
ज़िंदगी को गुज़ारने के लिएवक़्त का ज़हर मारने के लिएअपना ग़ुस्सा उतारने के लिएफ़ोन पर शब गुज़ारने के लिएदोस्त सच मुच बहुत ज़रूरी हैं
बाक़ी आधे कमरे में क्या हो रहा हैलड़कियाँक्या हर्फ़ चुन रही हैंइस्तिआरे के लिहाज़ सेहराम के बच्चे गिन रही हैंलड़कियों के नाम क़ाफ़िए की वजह सेसारतर ज़ियादा नहीं रख पा रहा हैइस लिए उन की ग़ज़ल छोटी पड़ रही हैज़मीन के लिहाज़ से नक़्क़ादअपने कमरों से उखड़ने के लिए तय्यार नहींलेकिन उन्हों ने वादा किया हैसारे थिंकर इकट्ठे होंगेऔर बताएँगे कि सोसाइटी किया हैऔर क्यूँ हैवैसे हवाओं का काम है चलते फिरते रहनादूर-अँदेश की आँख कैसी हैसिगरेट के कश से बड़ी हैवो घड़े से पत्थर निकाल कर गिन रहे थेऔर कह रहे थे मैं इस घड़े का बानी हूँचाय के साथ ग़ीबत के केकज़रूरी होते हैंऔर चुग़ल-ख़ोरी की किताब का दीबाचाहर शख़्स लिखता हैज़बानों में बुझे तीरों से मक़्तूल ज़िंदा हो रहे हैंबड़ा इबलाग़ हैसोसाइटी के चेहरे पे वो ज़बान चलती हैकि एक एक बंदे के पासकिताबों की रियासत बंदे से ज़ियादा है
तुम्हारा मैं हूँ मिरे तुम हो अच्छे जुमले हैंमगर ये बात बहुत दूर है सदाक़त सेकहीं से तुम हो अधूरे कहीं से ख़ाली मैंतुम अपने तौर मुझे इस्तिमाल करते होमैं अपने तौर तुम्हें इस्तिमाल करता हूँये ज़िंदगी है यहाँ घात में है हर कोईसब अपनी अपनी ज़रूरत में छुप के बैठे हैंकहीं नहीं है मोहब्बत फ़रेब है सब कुछमगर ये झूटी मोहब्बत बहुत ज़रूरी हैहवा में जैसे हरारत बहुत ज़रूरी है
चमक दिखाते हैं ज़र्रे अब आसमानों कोज़बान मिल गई है सारे बे-ज़बानों कोजो ज़ुल्म सहते थे वो अब हिसाब माँगते हैंसवाल करते हैं और फिर जवाब माँगते हैंये कल की बात है सदियों पुरानी बात नहींकि कल तलक था यहाँ कुछ भी अपने हाथ नहींविदेशी राज ने सब कुछ निचोड़ डाला थाहमारे देश का हर कर्धा तोड़ डाला थाजो मुल्क सूई की ख़ातिर था औरों का मुहताजहज़ारों चीज़ें वो दुनिया को दे रहा है आजनया ज़माना लिए इक उमंग आया हैकरोड़ों लोगों के चेहरे पे रंग आया हैये सब किसी के करम से न है इनायत सेयहाँ तक आया है भारत ख़ुद अपनी मेहनत से
क्या ज़रूरी है कि हम फ़ोन पे बातें भी करेंक्या ज़रूरी है कि हर लफ़्ज़ महकने भी लगेक्या ज़रूरी है कि हर ज़ख़्म से ख़ुशबू आएक्या ज़रूरी है वफ़ादार रहें हम दोनोंक्या ज़रूरी है दवा सारी असर कर जाएक्या ज़रूरी है कि हर ख़्वाब हम अच्छा देखेंक्या ज़रूरी है कि जो चाहें वही हो जाएक्या ज़रूरी है कि मौसम हो हमारा साथीक्या ज़रूरी है सफ़र में कहीं साया भी मिलेक्या ज़रूरी है तबस्सुम यूँही मौजूद रहेक्या ज़रूरी है हर इक राह में जुगनू चमकींक्या ज़रूरी है कि अश्कों को रवानी भी मिलेक्या ज़रूरी है कि मिलना ही मुक़द्दर ठहरेक्या ज़रूरी है कि हर रोज़ मिलें हम दोनोंहम जहाँ गाँव बसाएँ वहाँ इक झील भी होक्या ज़रूरी है मोहब्बत तिरी तकमील भी हो
मैं आदम का बेटा हूँ और जानता हूँकि मर्द और औरत ही फ़ितरत की गाड़ी के पहिए हैं दोऔर दोनों ही लाज़िम हैं दोनों ज़रूरीन हो एक भी तो कहानी अधूरीमुझे ये ख़बर हैकि मर्द और औरत मोहब्बत के सिक्के के दो रुख़ हैंऔर दोनों रुख़ हैं ज़रूरीन हो एक भी तो कहानी अधूरीतुम और मैं बहुत देर से हम सफ़र हैंतुम और मैं इकट्ठे ही जन्नत के घर से निकाले गए थेऔर इस ख़ाक-दाँ में उछाले गए थे
देवता है कोई हम मेंन फ़रिश्ता कोईछू के मत देखनाहर रंग उतर जाता हैमिलने-जुलने का सलीक़ा है ज़रूरी वर्नाआदमी चंद मुलाक़ातों में मर जाता है
चलो मोहब्बत की बात करेंअबमैले जिस्मों से ऊपर उठ करभूलते हुए कि कभीघुटने टेक चुके हैं हमऔर देख चुके हैंअपनी रूह को तार तार होतेझूटे फ़ख़्र के साथचलो मोहब्बत की बात करेंज़िंदगी के पैरों तलेबे-रहमी से रौंदे जाने के बा'दमरहम लगाएँ ज़ख़्मी वजूद परजो शर्म से आँखें झुका करबैठा है सपनों के मज़ार पेइस से बुरी कोई बात नहीं कर सकतेहम अपनी ही ज़िद मेंधोका दे चुके हैं अपने-आप कोखेल चुके हैं ख़ुद अपनी इज़्ज़त सेभोग चुके हैं झूट को सच की तरहअबइन हालात मेंकोई ग़ैर-ज़रूरी बात ही कर सकते हैं हमआओ मोहब्बत की बात करें
चलो हम मान लेते हैं बिछड़ना ही ज़रूरी हैचलो हम मान लेते हैं मुक़द्दर में ही दूरी हैचलो हम मान लेते हैं तुम्हारी जो है मजबूरीचलो हम मान लेते हैं मिले हम देर से तुम सेचलो माना कि बाँधे है रसन हालात की तुम कोचलो माना जुदाई के सिवा चारा नहीं कोई
ज़रूरी काग़ज़ों की फ़ाइलों सेबे-ज़रूरीकाग़ज़ों कोछाँटा जाता हैकभी कुछ फेंका जाता हैकभी कुछ बाँटा जाता हैकई बरसों के रिश्तों कोपलों मेंकाटा जाता हैवो शीशा होकि पत्थर होबिना दुम का वो बंदर होनिशानों से भराया कोई बोसीदा कैलेंडर होपुराने घर के ताक़ों मेंमचानों मेंवो सब!!छोटा हुआ अपनाकभी बन कर कोई आँसूकभी बन कर कोई सपनाअचानकजगमगाता हैवो सब खोया हुआअपने न होने से सताता हैमकानों के बदलने सेनए ख़ानों में ढलने सेबहुत कुछ टूट जाता हैबहुत कुछ छूट जाता है
तो क्या वो झूट थातू ने जो उस लड़की से बोला थामैं तेरी झील जैसीनीली आँखों पर ग़ज़ल के शे'र लिक्खूंगामैं तेरी रेशमी ज़ुल्फ़ों मेंअपनी नज़्म के मोती पिरोउँगामैं तेरी दूधिया रंगत कलाई मेंतिलाई चूड़ियों ऐसेखनकते गीत पहनाने का ख़्वाहाँ हूँमुझे मा'लूम है फ़ुर्सत नहीं मिलतीबहुत से और मौज़ूआत भीमाना ज़रूरी हैंमगर उस से किया वा'दाभला क्या कम ज़रूरी हैतू ऐसा करकोई अपनी पुरानी नज़्म उस के नाम कर देयाग़ज़ल के शे'र में रद्द-ओ-बदल कर केकिसी सूरत भी उस का तज़्किरा कर देजो तेरी शाइरी के आइने के सामनेसिंघार करने बैठ जाती हैनहींमुझ से तो ऐसा भी नहीं मुमकिनउसे मेरी सभी नज़्मेंसभी ग़ज़लेंज़बानी याद होती हैंउसे तो मेरी वो ग़ज़लें भी अज़बर हैंजो मैं नेजा के सदियों बा'द कहनी हैंमैं उन याक़ूत होंटों परफ़क़तख़ामोशियाँ ही सब्त करता हूँ
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
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