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ईदगाह

प्रेमचंद

ईदगाह

प्रेमचंद

MORE BYप्रेमचंद

    स्टोरीलाइन

    ईद जैसे महत्वपूर्ण त्योहार को आधार बनाकर ग्रामीण मुस्लिम जीवन का सुंदर चित्र प्रस्तुत किया गया है। हामिद का चरित्र हमें बताता है कि अभाव उम्र से पहले बच्चों में कैसे बड़ों जैसी समझदारी पैदा कर देता है। मेले में हामिद अपनी हर इच्छा पर संयम रखने में विजयी होता है। और अपनी दादी अमीना के लिए एक चिमटा ख़रीद लेता है ताकि रोटी पकाते वक़्त उसके हाथ न जलें।

    (1)

    रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद आज ईद आई। कितनी सुहानी और रंगीन सुब्ह है। बच्चे की तरह पुर-तबस्सुम दरख़्तों पर कुछ अ'जीब हरियावल है। खेतों में कुछ अ'जीब रौनक़ है। आसमान पर कुछ अ'जीब फ़िज़ा है। आज का आफ़ताब देख कितना प्यारा है। गोया दुनिया को ईद की ख़ुशी पर मुबारकबाद दे रहा है। गाँव में कितनी चहल-पहल है। ईदगाह जाने की धूम है। किसी के कुरते में बटन नहीं हैं तो सुई-तागा लेने दौड़े जा रहा है। किसी के जूते सख़्त हो गए हैं। उसे तेल और पानी से नर्म कर रहा है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते लौटते दोपहर हो जाएगी। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैंकड़ों रिश्ते, क़राबत वालों से मिलना मिलाना। दोपहर से पहले लौटना ग़ैर-मुम्किन है।

    लड़के सब से ज़्यादा ख़ुश हैं। किसी ने एक रोज़ा रखा, वो भी दोपहर तक। किसी ने वो भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी इनका हिस्सा है। रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे, बच्चों के लिए तो ईद है। रोज़ ईद का नाम रटते थे, आज वो गई। अब जल्दी पड़ी हुई है कि ईदगाह क्यूँ नहीं चलते। उन्हें घर की फ़िक़्रों से क्या वास्ता? सेवइयों के लिए घर में दूध और शकर, मेवे हैं या नहीं, इसकी उन्हें क्या फ़िक्र? वो क्या जानें अब्बा क्यूँ बद-हवास गाँव के महाजन चौधरी क़ासिम अली के घर दौड़े जा रहे हैं, उनकी अपनी जेबों में तो क़ारून का ख़ज़ाना रक्खा हुआ है। बार-बार जेब से ख़ज़ाना निकाल कर गिनते हैं। दोस्तों को दिखाते हैं और ख़ुश हो कर रख लेते हैं। इन्हीं दो-चार पैसों में दुनिया की सात नेमतें लाएँगे। खिलौने और मिठाईयाँ और बिगुल और ख़ुदा जाने क्या क्या।

    सब से ज़्यादा ख़ुश है हामिद। वो चार साल का ग़रीब ख़ूबसूरत बच्चा है, जिसका बाप पिछले साल हैज़ा की नज़्र हो गया था और माँ जाने क्यूँ ज़र्द होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता चला कि बीमारी क्या है। कहती किस से? कौन सुनने वाला था? दिल पर जो गुज़रती थी, सहती थी और जब सहा गया तो दुनिया से रुख़्सत हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही ख़ुश है। उसके अब्बा जान बड़ी दूर रुपये कमाने गए थे और बहुत सी थैलियाँ लेकर आएँगे। अम्मी जान अल्लाह मियाँ के घर मिठाई लेने गई हैं। इसलिए ख़ामोश है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं। सर पर एक पुरानी धुरानी टोपी है जिसका गोटा स्याह हो गया है फिर भी वो ख़ुश है। जब उसके अब्बा जान थैलियाँ और अम्माँ जान नेमतें लेकर आएँगे, तब वो दिल के अरमान निकालेगा। तब देखेगा कि महमूद और मोहसिन आज़र और समी कहाँ से इतने पैसे लाते हैं। दुनिया में मुसीबतों की सारी फ़ौज लेकर आए, उसकी एक निगाह-ए-मासूम उसे पामाल करने के लिए काफ़ी है।

    हामिद अंदर जा कर अमीना से कहता है, “तुम डरना नहीं अम्माँ! मैं गाँव वालों का साथ छोड़ूँगा। बिल्कुल डरना लेकिन अमीना का दिल नहीं मानता। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद क्या अकेला ही जाएगा। इस भीड़-भाड़ में कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं अमीना इसे तन्हा जाने देगी। नन्ही सी जान। तीन कोस चलेगा तो पाँव में छाले पड़ जाएँगे?

    मगर वो चली जाए तो यहाँ सेवइयाँ कौन पकाएगा, भूका प्यासा दोपहर को लौटेगा, क्या उस वक़्त सेवइयाँ पकाने बैठेगी। रोना तो ये है कि अमीना के पास पैसे नहीं हैं। उसने फ़हमीन के कपड़े सिए थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आई थी इस ईद के लिए। लेकिन घर में पैसे और थे और ग्वालिन के पैसे और चढ़ गए थे, देने पड़े। हामिद के लिए रोज़ दो पैसे का दूध तो लेना पड़ता है। अब कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में और पाँच अमीना के बटवे में। यही बिसात है। अल्लाह ही बेड़ा पार करेगा। धोबन, मेहतरानी और नाइन भी आएँगी। सब को सेवइयाँ चाहिएँ। किस-किस से मुँह छुपाए? साल भर को त्यौहार है। ज़िंदगी ख़ैरियत से रहे। उनकी तक़दीर भी तो उसके साथ है। बच्चे को ख़ुदा सलामत रक्खे, ये दिन भी यूँ ही कट जाएँगे।

    गाँव से लोग चले और हामिद भी बच्चों के साथ था। सब के सब दौड़ कर निकल जाते। फिर किसी दरख़्त के नीचे खड़े हो कर साथ वालों का इंतिज़ार करते। ये लोग क्यूँ इतने आहिस्ता-आहिस्ता चल रहे हैं।

    शहर का सिरा शुरू हो गया। सड़क के दोनों तरफ़ अमीरों के बाग़ हैं, पुख़्ता चहार-दीवारी हुई है। दरख़्तों में आम लगे हुए हैं। हामिद ने एक कंकरी उठा कर एक आम पर निशाना लगाया। माली अदंर गाली देता हुआ बाहर आया... बच्चे वहाँ एक फ़र्लांग पर हैं। ख़ूब हँस रहे हैं। माली को ख़ूब उल्लू बनाया।

    बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। ये अदालत है। ये मदरसा है। ये क्लब-घर है। इतने बड़े मदरसे में कितने सारे लड़के पढ़ते होंगे। लड़के नहीं हैं जी, बड़े-बड़े आदमी हैं। सच उनकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं। इतने बड़े हो गए, अब तक पढ़ने जाते हैं। आज तो छुट्टी है लेकिन एक बार जब पहले आए थे। तो बहुत से दाढ़ी मूँछों वाले लड़के यहाँ खेल रहे थे। जाने कब तक पढ़ेंगे। और क्या करेंगे इतना पढ़ कर। गाँव के देहाती मदरसे में दो तीन बड़े-बड़े लड़के हैं। बिल्कुल तीन कौड़ी के... काम से जी चुराने वाले। ये लड़के भी इसी तरह के होंगे जी। और क्या नहीं... क्या अब तक पढ़ते होते। वो क्लब-घर है। वहाँ जादू का खेल होता है। सुना है मर्दों की खोपड़ियाँ उड़ती हैं। आदमी बेहोश कर देते हैं। फिर उससे जो कुछ पूछते हैं, वो सब बतला देते हैं और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं और मेमें भी खेलती हैं। सच, हमारी अम्माँ को वो दे दो क्या कहलाता है। ‘बैट’ तो उसे घुमाते ही लुढ़क जाएँ।

    मोहसिन ने कहा “हमारी अम्मी जान तो उसे पकड़ ही सकें। हाथ काँपने लगें। अल्लाह क़सम”

    हामिद ने उससे इख़्तिलाफ़ किया। “चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। ज़रा सी बैट पकड़ लेंगी तो हाथ काँपने लगेगा। सैंकड़ों घड़े पानी रोज़ निकालती हैं। किसी मेम को एक घड़ा पानी निकालना पड़े तो आँखों तले अंधेरा जाए।”

    मोहसिन, “लेकिन दौड़ती तो नहीं। उछल-कूद नहीं सकतीं।”

    हामिद, “काम पड़ता है तो दौड़ भी लेती हैं। अभी उस दिन तुम्हारी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी तो तुम्हारी अम्माँ ही तो दौड़ कर उसे भगा लाई थीं। कितनी तेज़ी से दौड़ी थीं। हम तुम दोनों उनसे पीछे रह गए।”

    फिर आगे चले। हलवाइयों की दुकानें शुरू हो गईं। आज ख़ूब सजी हुई थीं।

    इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो एक एक दुकान पर मनों होंगी। सुना है रात को एक जिन्नात हर एक दुकान पर जाता है। जितना माल बचा होता है, वो सब ख़रीद लेता है और सच-मुच के रुपये देता है। बिल्कुल ऐसे ही चाँदी के रुपये।

    महमूद को यक़ीन आया। ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जाएँगे।

    मोहसिन, “जिन्नात को रुपयों की क्या कमी? जिस ख़ज़ाने में चाहें चले जाएँ। कोई उन्हें देख नहीं सकता। लोहे के दरवाज़े तक नहीं रोक सकते। जनाब आप हैं किस ख़याल में। हीरे-जवाहरात उनके पास रहते हैं। जिससे ख़ुश हो गए, उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। पाँच मिनट में कहो, काबुल पहुँच जाएँ।”

    हामिद, “जिन्नात बहुत बड़े होते होंगे।

    मोहसिन, “और क्या एक एक आसमान के बराबर होता है। ज़मीन पर खड़ा हो जाए, तो उसका सर आसमान से जा लगे। मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए।”

    समी सुना है चौधरी साहब के क़ब्ज़े में बहुत से जिन्नात हैं। कोई चीज़ चोरी चली जाए, चौधरी साहब उसका पता बता देंगे और चोर का नाम तक बता देंगे। जुमेराती का बछड़ा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं मिला, तब झक मार कर चौधरी के पास गए। चौधरी ने कहा, मवेशी-ख़ाने में है और वहीं मिला। जिन्नात कर उन्हें सब ख़बरें दे जाया करते हैं।

    अब हर एक की समझ में गया कि चौधरी क़ासिम अली के पास क्यूँ इस क़दर दौलत है और क्यूँ उनकी इतनी इज़्ज़त है। जिन्नात कर उन्हें रुपये दे जाते हैं। आगे चलिए, ये पुलिस लाइन है। यहाँ पुलिस वाले क़वाएद करते हैं। राइट, लिप, फाम, फो।

    नूरी ने तस्हीह की, “यहाँ पुलिस वाले पहरा देते हैं। जब ही तो उन्हें बहुत ख़बर है। अजी हज़रत ये लोग चोरियाँ कराते हैं। शहर के जितने चोर डाकू हैं, सब उनसे मिले रहते हैं। रात को सब एक महल्ले में चोरों से कहते हैं और दूसरे महल्ले में पुकारते हैं जागते रहो। मेरे मामूँ साहब एक थाने में सिपाही हैं। बीस रुपये महीना पाते हैं लेकिन थैलियाँ भर-भर घर भेजते हैं। मैंने एक बार पूछा था, “मामूँ, आप इतना रुपये लाते कहाँ से हैं?” हँस कर कहने लगे, “बेटा... अल्लाह देता है।” फिर आप ही आप बोले, हम चाहें तो एक ही दिन में लाखों बार रुपये मार लाएँ। हम तो उतना ही लेते हैं जिसमें अपनी बदनामी हो और नौकरी बनी रहे।

    हामिद ने तअ'ज्जुब से पूछा, “ये लोग चोरी कराते हैं तो इन्हें कोई पकड़ता नहीं?” नूरी ने उसकी कोताह-फ़हमी पर रहम खा कर कहा, “अरे अहमक़! उन्हें कौन पकड़ेगा, पकड़ने वाले तो ये ख़ुद हैं, लेकिन अल्लाह उन्हें सज़ा भी ख़ूब देता है। थोड़े दिन हुए। मामूँ के घर में आग लग गई। सारा माल-मता जल गया। एक बर्तन तक बचा। कई दिन तक दरख़्त के साये के नीचे सोए, अल्लाह क़सम फिर जाने कहाँ से क़र्ज़ लाए तो बर्तन भाँडे आए।”

    बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जाने वालों के मजमे नज़र आने लगे। एक से एक ज़र्क़-बर्क़ पोशाक पहने हुए। कोई ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर चलते थे तो कपड़ों से इत्र की ख़ुश्बू उड़ती थी।

    दहक़ानों की ये मुख़्तसर सी टोली अपनी बे सर-ओ-सामानी से बे-हिस अपनी ख़स्ता हाली में मगर साबिर-ओ-शाकिर चली जाती थी। जिस चीज़ की तरफ़ ताकते ताकते रह जाते और पीछे से बार बार हॉर्न की आवाज़ होने पर भी ख़बर होती थी। मोहसिन तो मोटर के नीचे जाते जाते बचा।

    वो ईदगाह नज़र आई। जमा'अत शुरू हो गई है। ऊपर इमली के घने दरख़्तों का साया है, नीचे खुला हुआ पुख़्ता फ़र्श है। जिस पर जाजिम बिछा हुआ है और नमाज़ियों की क़तारें एक के पीछे दूसरे ख़ुदा जाने कहाँ तक चली गई हैं। पुख़्ता फ़र्श के नीचे जाजिम भी नहीं। कई क़तारें खड़ी हैं जो आते जाते हैं, पीछे खड़े होते जाते हैं। आगे अब जगह नहीं रही। यहाँ कोई रुत्बा और ओहदा नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। दहक़ानों ने भी वज़ू किया और जमा'अत में शामिल हो गए। कितनी बा-क़ाएदा मुनज़्ज़म जमा'अत है, लाखों आदमी एक साथ झुकते हैं, एक साथ दो ज़ानू बैठ जाते हैं और ये अ'मल बार-बार होता है। ऐसा मालूम हो रहा है गोया बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ रौशन हो जाएँ और एक साथ बुझ जाएँ।

    कितना पुर-एहतिराम रौब-अंगेज़ नज़ारा है। जिसकी हम-आहंगी और वुसअ'त और ता'दाद दिलों पर एक विजदानी कैफ़ियत पैदा कर देती है। गोया उख़ुव्वत का रिश्ता इन तमाम रूहों को मुंसलि