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क्या आप जानते हैं?

ग़ज़ल उर्दू शायरी की सबसे लोकप्रिय विधा है। ग़ज़ल अरबी शब्द है जिसके शाब्दिक अर्थ हैं औरतों से बातें करना या औरतों के बारे में बातें करना। हिरन के बच्चे के मुंह से निकलने वाली दर्द भरी आवाज़ को ग़ज़ल का नाम दिया जाता है। ग़ज़ल की शुरुआत अरब से हुई, वहां से ईरान पहुंची और फ़ारसी साहित्य के रास्ते उर्दू साहित्य में लोकप्रिय हो गई और रशीद अहमद सिद्दीकी के अनुसार यह उर्दू शायरी की आबरू है। इसका सुर और संगीत से भी गहरा संबंध है।
ग़ज़ल समान क़ाफ़िया व छंद और समान रदीफ़ पंक्तियों से बने अश्आर का संग्रह होती है। रदीफ़ वह शब्द या शब्दों का संग्रह है जो हर शे'र के आख़िर में दोहराया जाये। क़ाफ़िया वह समान ध्वनि वाले शब्द होते हैं जो रदीफ़ से पहले आते हैं:
बस्ती अपनी हुबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है
इसमें "हुबाब" और "सराब" क़ाफ़िया हैं और "सी है" रदीफ़ है। मतला ग़ज़ल का पहला शे'र होता है जिसमें शे'र के दोनों मिस्रे (पंक्तियां) समान क़ाफ़िया और समान रदीफ़ के होते हैं। बाद के शे'रों में पहले मिस्रे में यह पाबंदी नहीं होती। आख़िरी शे'र जिसमें शायर का तख़ल्लुस इस्तेमाल होता है मक़ता कहलाता है।
ग़ज़ल का हर शे'र अपनी जगह एक पूर्ण इकाई होता है जिसमें अलग अलग पूरा मज़्मून बांधा जाता है। कभी कभी एक पूरी ग़ज़ल भी किसी एक विषय पर आधारित हो सकती है। ग़ज़ल का विषय वस्तु बहुत व्यापक है, उसमें भावनाओं की अभिव्यक्ति,विरह और मिलन की स्थिति, ज़माने की शिकायत, तसव्वुफ़ और यथार्थ व ज्ञान शामिल हैं।

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हैदर

राजकपूर की फिल्म "दीवाना"के एक मशहूर गाने का मुखड़ा असल में हैदर अली आतिश का शे'र है जिसमें हसरत जयपुरी ने थोड़ा बदल दिया था।आतिश का शे'र है:
ऐ सनम जिसने तुझे चांद सी सूरत दी है
उसी अल्लाह ने मुझ को भी मुहब्बत दी है
फिल्मी गाने में शे'र का दूसरा मिस्रा यूं बदल दिया गया:
उसी मालिक ने मुझे भी तो मुहब्बत दी है
ख़्वाजा हैदर अली आतिश (1778-1848 ) की पैदाइश फ़ैज़ाबाद में हुई थी। बहुत शानदार और ख़ूबसूरत थे। रख रखाव अपने समय के "बांकों" जैसी बनाए रखते थे, तलवार बाज़ी सीखी थी। कमसिनी से "तलवारिए" मशहूर हो गए थे, शायरी से रुचि भी बचपन से थी। नवाब मिर्ज़ा मुहम्मद तक़ी ख़ां तक़ी, रईस फ़ैज़ाबाद ने उनको मुलाज़िम रख लिया था।जब नवाब फ़ैज़ाबाद छोड़ कर लखनऊ आ गए तो आतिश भी उनके साथ लखनऊ चले गए। उनकी ग़ज़लों में लखनवियत का रंग ज़रूर है लेकिन ख़ुशबू दिल्ली की है। नासिख़ से उनकी समकालिक नोक झोंक चलती रहती थी। आतिश आज़ाद स्वभाव थे। नवाब के देहांत के बाद किसी की नौकरी नहीं की। कुछ तज़्किरों के अनुसार वाजिद अली शाह अपने शहज़ादगी के दिनों से ही अस्सी रुपए मासिक देते थे। आख़िरी वक्त तक आतिश के घर के बाहर एक घोड़ा ज़रूर बंधा रहता था। एक तलवार कमर में बांधे, तिरछी टोपी लगाए सिपाहियाना बांकपन आख़िर तक क़ायम रहा।

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शह्र ए आशोब उर्दू शायरी की एक क्लासिकी विधा है जो एक ज़माने में बहुत लिखी गई थी। यह ऐसी नज़्म होती है जिसमें किसी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कठिनाईयों की वजह से किसी शहर की परेशानी और बर्बादी का हाल बयान किया गया हो। शह्र ए आशोब मसनवी, क़सीदा, रूबाई, क़तात, मुख़म्मस और मुसद्दस के रूप में लिखे गए हैं। मिर्ज़ा मुहम्मद रफ़ी सौदा और मीर तक़ी मीर के शह्र ए आशोब जिनमें अवाम की बेरोज़गारी, आर्थिक कठिनाई और दिल्ली की तबाही व बर्बादी का उल्लेख है, उर्दू के यादगार शह्र ए आशोब हैं। नज़ीर अकबराबादी ने अपने शह्र ए आशोबों में आगरे की बदहाली, फ़ौज की ख़राब स्थिति और शरीफ़ों के अपमान का हाल बहुत ख़ूबी से प्रस्तुत किया है। 1857 की स्वतंत्रता संग्राम के बाद दिल्ली पर जो मुसीबत टूटी, उसे भी दिल्ली के अधिकतर शायरों ने अपना विषय बनाया है जिनमें ग़ालिब, दाग़ देहलवी और मौलाना हाली शामिल हैं। 1954 में हबीब तनवीर ने नज़ीर अकबराबादी की शायरी पर आधारित अपने मशहूर नाटक "आगरा बाज़ार" में उनके एक शह्र ए आशोब को बहुत ही प्रभावी ढंग से मंच पर गीत के रूप में प्रस्तुत किया था।

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पिछले वर्ष दुनिया के विश्वस्त अंग्रेज़ी शब्दकोश कैम्ब्रिज में उर्दू भाषा का सबसे ज़्यादा बोला जाने वाला शब्द "अच्छा" शामिल कर लिया गया। "अच्छा" शब्द शामिल किए जाने के साथ यह भी बताया गया है कि उल्लेखनीय शब्द भारतीय अंग्रेज़ी में भी आम तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। शब्दकोश में शब्द "अच्छा" को शामिल करते हुए उसके मायने ख़ुशी और आश्चर्य को व्यक्त करने के रूप में अंकित किया गया है और साथ ही वाक्य में प्रयोग करने के उदाहरण भी दिए गए हैं। लेकिन उर्दू में शब्द "अच्छा" कई और अर्थों में भी इस्तेमाल होता है, उदाहरण के लिए:
मुनासिब, ठीक, दुरुस्त,बुरा का विलोम, बहुत खूब (व्यंग्य के रूप में), तसल्ली, आश्वस्त, देखा जाएगा,समझे?,सुन लिया?(चेतावनी के लिए), इजाज़त है?, जैसे मशहूर फ़िल्मी गाना "अच्छा तो हम चलते हैं"
यह शब्द स्वस्थ्य,निरोग होने के लिए भी इस्तेमाल होता है जैसे ग़ालिब का ये शे'र:
दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ

क्या आप जानते हैं?

"हज्व" उर्दू शायरी की एक विधा है जिसमें शायर किसी व्यक्ति या प्रतिद्वंद्वी के ख़िलाफ़ अपने गुस्से को व्यक्त करता है। कुछ लोग हज्व को क़सीदे ही का एक रूप मानते हैं। उर्दू में नियमित रूप से हज्व कहने का आरंभ मुहम्मद रफ़ी सौदा(1713-1781) से होता है। उन्होंने अपने हज्वों के लिए क़सीदा, मसनवी, क़ता, ग़ज़ल, रुबाई अर्थात सभी विधाओं का इस्तेमाल किया है।
मुहम्मद हुसैन आज़ाद "आब ए हयात" में लिखते हैं कि सौदा का 'ग़ुंचा' नाम का एक सेवक था जो हर समय सेवा में उपस्थित रहता था और साथ साथ क़लमदान लिए फिरता था। सौदा जब किसी से नाराज़ होते तो तुरंत पुकारते,"अरे ग़ुंचा, ला तो क़लमदान, ज़रा मैं इसकी ख़बर तो लूं, ये मुझे समझा क्या है।"
सौदा ने विभिन्न प्रकार की हज्वियात कही हैं। वो जो समकालिक नोक झोंक से भरपूर हैं या फिर शिष्टाचार के सुधार के लिए लिखी हैं या जिनमें अपने दौर की राजनीतिक दुर्दशा और आर्थिक बदहाली पर व्यंग्य है और हास्य उड़ाया गया है। सौदा ने एक हाथी और घोड़े की भी हज्वें लिखी हैं। उनकी मशहूर "तज़्हीक ए रोज़गार" वैसे तो एक दुर्बल घोड़े की हज्व है लेकिन वास्तव में यह मुग़ल सल्तनत के आखिरी दौर का रूपक है जो उस दौर की राजनीतिक और आर्थिक विपन्नता का प्रतिनिधि है।