aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
शब्दार्थ
दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या
ज़ख़्म के भरते तलक नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या
"दोस्त ग़म-ख़्वारी में मेरी सई फ़रमावेंगे क्या" ग़ज़ल से की मिर्ज़ा ग़ालिब