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तोहफ़त-उल-हिंद

शिबली नोमानी


अनुवाद : Rekhta Editor

शिबली नोमानी

तोहफ़त-उल-हिंद

शिबली नोमानी

MORE BYशिबली नोमानी

    मुसलमानों का ब्रज भाषा पर ध्यान, ब्रज भाषा का इल्म-ए-बयान

     

    याद होगा कि हमारे एक सम्मानित हिंदू दोस्त ने 'उर्दू-ए-मुअल्ला' में एक लेख लिखा था जिसमें इस बात पर एतराज़ जताते हुए अफ़सोस ज़ाहिर किया था कि मुसलमानों ने 6 सौ बरस तक इस मुल्क में हाकिम रहकर कभी यहाँ की ज़बान की तरफ़ ध्यान नहीं दिया। हमने इसका जवाब 'अल-नदवा' में तफ़्सील से दो अंकों में लिखा था, जिसमें बताया था कि मुसलमानों ने हिंदुओं की ज़बान को कितनी अहमियत दी, और ख़ुद ब्रज भाषा में किस दर्जे की क़ाबिलियत पैदा की। यह लेख भी उसी सिलसिले की एक कड़ी है।

     

    'तोहफ़त-उल-हिंद' जो हमारे लेख का शीर्षक है, एक किताब का नाम है जो औरंगज़ेब आलमगीर के ज़माने में लिखी गई। इसके लेखक का नाम मिर्ज़ा ख़ान बिन फ़ख़रुद्दीन मुहम्मद है। इसकी भूमिका में लिखा है कि मैंने यह किताब शहंशाह आलमगीर के ज़माने में शहज़ादा आज़म शाह के पढ़ने के लिए लिखी। किताब का विषय हिंदुओं का इल्म-ए-बलाग़त (अलंकार शास्त्र) और उरूज़-ओ-क़ाफ़िया (छंद और तुकबंदी) वग़ैरह है, इसमें 7 अध्याय हैं:

     

    (1) पिंगल, यानी इल्म-ए-उरूज़ (छंद शास्त्र)

    (2) तुक, यानी क़ाफ़िया

    (3) अलंकार, यानी इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र)

    (4) शृंगार रस, यानी इश्क़-ओ-मोहब्बत

    (5) सामुद्रिक, यानी इल्म-ए-क़ियाफ़ा (लक्षण शास्त्र)

    (6) कोक, यानी इल्म-उन-निसा (कामशास्त्र)

    (7) लुग़ात-ए-हिंदी (हिंदी शब्दकोश)। इसमें ब्रज भाषा के ज़रूरी और बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले शब्द लिखे हैं और उनके मायने बताए हैं।

     

    यह किताब आलमगीर के ज़माने में लिखी गई है और उसके सबसे चहेते और लाडले बेटे के लिए लिखी गई है। आलमगीर के बारे में उसके विरोधियों का दावा है कि वह कट्टरपन का देवता था और उसने हिंदुओं की न सिर्फ़ इमारतें, बल्कि उनके लिटरेचर को भी मिटा देना चाहा था और इसलिए उनके तमाम शिक्षण संस्थान और पाठशालाएँ बंद करा दी थीं। यह भी याद रखना चाहिए कि यह तारीख़ की मानी हुई बात है कि आलमगीर मुल्क के एक-एक छोटे वाक़ये से इस क़दर वाक़िफ़ रहता था कि मुल्क के किसी हिस्से का मामूली सा वाक़या भी उसकी खोजी नज़र से छुप नहीं सकता था। इसके बावजूद ब्रज भाषा को जितनी उसके ज़माने में तरक़्क़ी मिली, मुसलमानों ने जितने उसके ज़माने में हिंदी किताबों के तर्जुमे किए और ख़ुद जितनी ब्रज भाषा में नज़्म और नस्र (गद्य और पद्य) लिखी, किसी ज़माने में इस क़दर हिंदी की तरफ़ तवज्जो नहीं दी गई थी। चुनांचे इसकी तफ़्सील हम एक अलग लेख में लिख चुके हैं। यह किताब (तोहफ़त-उल-हिंद) इसी सिलसिले की एक कड़ी है। यह नामुमकिन है कि आलमगीर जो अपने बेटों की एक-एक हरकत की ख़बर रखता था, उसकी नज़र से एक किताब जो उसके सबसे प्यारे शहज़ादे के लिए लिखी जाए, छुपी रह जाए। नेमत ख़ान आली ने 'वक़ाए' लिखी और आलमगीर से छुपाने की बेइंतहा कोशिश की, लेकिन छुप न सकी।

     

    इस किताब में से हम सिर्फ़ सनाए-ओ-बदाए (अलंकारों) के हिस्से का अंश दर्ज करते हैं। जिससे अंदाज़ा होगा कि हिंदी ज़बान के इल्म-ए-बदीअ (अलंकार शास्त्र) की अरबी से क्या तुलना है? इस मौक़े पर यह बात भी बताने के क़ाबिल है कि लेखक ने हिंदी सनाए-ओ-बदाए की तफ़्सील लिखकर कुछ सिफ़तें (विशेषताएँ/अलंकार) ख़ुद बढ़ाई हैं। उनके ख़ुद नाम रखे हैं और उन सिफ़तों में ख़ुद हिंदी शेर कहकर किताब में दर्ज किए हैं। जिससे अंदाज़ा हो सकता है कि लेखक को ख़ुद इस ज़बान पर कितनी महारत थी? ये सनाए (अलंकार) अक्सर बल्कि तक़रीबन सब अरबी से लिए हैं और अरबी नामों का तर्जुमा भाषा में कर दिया है। भाषा में इल्म-ए-बदीअ को अलंकार कहते हैं, चूँकि बलाग़त (अभिव्यक्ति की कला) का असली काम जज़्बात और एहसासात पर असर डालना है, इसलिए अलंकार की तीन क़िस्में तय की हैं।

     

    (1) नवरस

    इसमें तमाम एहसासात (भावनाओं) का गहराई से जायज़ा लिया गया है और उनकी नौ क़िस्में तय की गई हैं, जिनकी तफ़्सील नीचे दी गई है:

     

    शृंगार रस, इसकी दो क़िस्में हैं, संजोग, वियोग। यानी मिलन और जुदाई,

    हास्य रस, ख़ुशी और आनंद, करुणा रस, रहम और हमदर्दी

    वीर रस, बहादुरी और शूरवीरता, रौद्र रस, ग़ुस्सा और क्रोध

    भय रस, ख़ौफ़ और डर, वीभत्स रस, नफ़रत और कराहत।

    शांत रस, सुकून और इत्मीनान, अद्भुत रस, हैरत और आश्चर्य

     

    अरबी और फ़ारसी ज़बान में इस क़िस्म का साइंटिफ़िक (वैज्ञानिक) बँटवारा नहीं है और इस लिहाज़ से हिंदी को फ़ारसी और अरबी पर तरजीह (प्राथमिकता) हासिल है।

     

    (2) व्यंग्य

    किसी बात को लतीफ़ (सूक्ष्म), नाज़ुक और शोख़ अंदाज़ में कहने को कहते हैं, मसलन औरत अपने महबूब शौहर से जो किसी और औरत पर आशिक़ है, कहती है कि प्यारे! तेरी पेशानी (माथे) पर जो सुर्खी है यह तेरी सुर्ख़ टोपी की परछाईं है, या सौतन की मेंहदी का असर है। सवाल से बज़ाहिर सिर्फ़ इतना मतलब निकलता है कि औरत को अपने शौहर से सौतन के पास जाने और उससे मिलने की शिकायत है, लेकिन परोक्ष रूप से वह यह बात साबित करना चाहती है कि शौहर ने सौतन के पाँव पर पेशानी रगड़ी है, जिससे पेशानी में सुर्खी आ गई है। यह वह सिफ़त है जिसको अरबी में 'तारीज़' कहते हैं। संस्कृत का लेखक इस सिफ़त को इतना विस्तार देता है कि अल्फ़ाज़ और वाक्यों की ज़रूरत नहीं। सिर्फ़ हालत का दिखा देना भी इस सिफ़त में दाख़िल है, मसलन महबूब रात भर का जागा हुआ किसी महफ़िल से आया है जिसकी वजह से बाल बिखरे हैं, आँखें नशीली हैं, अंगड़ाइयों पर अंगड़ाइयाँ आ रही हैं, आशिक़ ज़बान से कुछ नहीं कहता, सिर्फ़ आईना लाकर सामने रख देता है कि यह सब कुछ कह देगा, यह भी इसी सिफ़त में दाख़िल है।

     

    (3) उपमा

    इसके मायने तश्बीह (तुलना) के हैं। तश्बीह एक निहायत लतीफ़ (सूक्ष्म) सिफ़त है। अरबी में इसको बहुत विस्तार दिया गया है और इसकी बहुत सी क़िस्में की गई हैं। भाषा में कुछ बातें तो समान हैं। मसलन उपमा यानी जब तश्बीह के अल्फ़ाज़ मौजूद हों, जैसे 'चूँ', 'मिस्ल' (समान) वग़ैरह।

     

    वस्तु उपमा

    हर्फ़-ए-तश्बीह (तुलना का शब्द) मौजूद नहीं, लेकिन छिपा हुआ है जैसे क़ंद-ए-लब यानी लब चूँ क़ंद (होंठ जैसे मिसरी), इसको अरबी में इस्तियारा (रूपक) कहते हैं।

     

    लेकिन कुछ बातों में नयापन है मसलन... मालोपमा, तश्बीह का यह तरीक़ा अरबी और फ़ारसी में नहीं, या है तो उसका कोई ख़ास नाम नहीं, यह वह सूरत है कि मुशब्बा-बिह (जिससे तुलना की जाए) के हिस्सों और विशेषताओं से तश्बीह देते हैं। मसलन चाँद की तश्बीह में कहा जाए कि वह एक बाग़ है, उसमें जो स्याही है वह दरख़्तों की छाँव है, उसकी किरणें दरख़्तों की टहनियाँ हैं, इसको तश्बीह-ए-मुरक्कब (मिश्रित उपमा) कह सकते हैं लेकिन यह कुछ हद तक उससे अलग सूरत है।

     

    शृंखला उपमा, इसमें सिलसिलेवार तश्बीह देते जाते हैं, यानी एक चीज़ को एक चीज़ से तश्बीह दी, फिर उसको किसी और चीज़ से तश्बीह दी, फिर उसको भी किसी और चीज़ से तश्बीह दी।

     

    अनन्वय उपमा

    यह वह सूरत है जिसको फ़ारसी में 'तश्बीह-उश-शै-ब-नफ़्सिही' कहते हैं, यानी किसी चीज़ को ख़ुद उसी चीज़ से तश्बीह देना, मसलन फ़ारसी में, 'चो तो गर कसे बाशद आँ हम तुई' (अगर तुम्हारे जैसा कोई है तो वह तुम ही हो)। उर्दू में आजकल कहते हैं, वह शख़्स आप अपनी नज़ीर (मिसाल) है। हक़ीक़त में यह मुबालग़े (अतिशयोक्ति) की एक सूरत है, यानी जब यह कहना होता है कि इस शख़्स की मिसाल नहीं तो यूँ कहते हैं कि वह अपना आप ही मिसाल है और कोई उसकी मिसाल नहीं। इस सिफ़त को फ़ारसी में और भी तरक़्क़ी दी गई है, यानी यूँ कहते हैं कि वह ख़ुद भी अपनी मिसाल नहीं। उर्दू में किसी का मिसरा है:

     

    तुम से जब तुम ही नहीं फिर कोई तुम सा क्या हो।

     

    अलंकार

    यह एक आम लफ़्ज़ है, जिसके मायने सनअत-ए-बदीअ (अलंकार) के हैं, संस्कृत में इसकी बहुत सी क़िस्में हैं, उनमें से 17 ज़्यादा मशहूर हैं, जिनकी तफ़्सील नीचे दी गई है।

     

    व्यतिरेक अलंकार

    यह वह सूरत है कि जिस चीज़ से ममदूह (जिसकी तारीफ़ की जा रही हो) को तश्बीह देते आए हैं उसमें ऐब साबित किया जाए ताकि ममदूह की श्रेष्ठता साबित हो, मसलन सख़ावत और दरियादिली में ममदूह को बादल से तश्बीह देते हैं, लेकिन उन्सरी कहता है:

     

    ओ हमी बख़्शद हम गिर्यद

    तो हमी बख़्शी ओ हमी ख़ंदी

     

    यानी बादल बरसता है तो रोता जाता है और तू बरसता है तो हँसता है।

     

    विरोधाभास अलंकार

    यानी इबारत (वाक्य) के मायने असल में सही हों लेकिन देखने में ग़लत मालूम हों। जब एक लफ़्ज़ के मायने अलग-अलग होते हैं तो इस खूबी से काम लेते हैं। मसलन भाषा में 'स्याम' काले को भी कहते हैं और माशूक़ को भी। इसी तरह 'लाल' सुर्ख़ को भी कहते हैं और महबूब को भी। अब अगर यह कहा जाए कि स्याम ज़र्द (पीला) है तो देखने में ग़लत होगा, क्योंकि काली चीज़ पीली नहीं हो सकती, लेकिन अगर स्याम के मायने महबूब के लिए जाएँ तो यह जुमला सही हो सकता है। अरबी में इस खूबी को बहुत विस्तार दिया गया है। 'मक़ामात-ए-हरीरी' में सौ मज़हबी सवाल और जवाब में, जवाब पूरी तरह ग़लत मालूम होते हैं लेकिन असल में सही हैं। मसलन एक सवाल यह है कि अगर कोई शख़्स वज़ू के बाद 'नअल' को छुए तो क्या हुक्म है, जवाब दिया है कि वज़ू टूट जाएगा। नअल अरबी में जूती को कहते हैं और यह मायने ज़्यादा आम हैं, लेकिन नअल, औरत को भी कहते हैं और शाफ़ेइयों के नज़दीक औरत के छूने से वज़ू टूट जाता है।

     

    सकारन उतप्रेछा

    हुस्न-ए-तालील को कहते हैं, यह खूबी अरबी और फ़ारसी में बहुत इस्तेमाल होती है। भाषा में इसके बहुत सुंदर नए-नए अंदाज़ मिलते हैं। मसलन चाँद माशूक़ का हुस्न चुरा कर आसमान पर भाग गया, इसी वजह से हमेशा चोरों की तरह रात को निकलता है, फ़ारसी का शायर कहता है:

     

    अज़ शर्म-ए-अबरवान-ए-बुलंद-ए-तो माह-ए-नौ

    ख़ुद रा चुनाँ नमूद कि कस दीद ओ कस न दीद

     

    यानी माशूक़ की भवों की शर्म से, नया चाँद इस तरह छुप कर निकला कि किसी ने देखा, किसी ने नहीं देखा।

     

    अकारन उतप्रेछा

    मुबालग़ा और इग़राक़ (अतिशयोक्ति) को कहते हैं।

     

    अनुकरन अलंकार

    लफ़्फ़-ओ-नश्र को कहते हैं।

     

    संदेह अलंकार

    यानी दो चीज़ों में जान-बूझ कर शक करना, मसलन यूँ कहें कि यह चेहरा है या चाँद, ज़ुल्फ़ है या साँप, अरबी में इसको तजाहुल-ए-आरिफ़ाना कहते हैं।

     

    सुछमान अलंकार

    यानी अल्फ़ाज़ और इबारत के बिना किसी मतलब को सिर्फ़ इशारे और संकेत से अदा करना, मसलन आशिक़ माशूक़ से सवाल करता है कि मैं कब आऊँ? माशूक़ कुछ जवाब नहीं देता बल्कि उसकी बजाय एक गोरे-चिट्टे आदमी को नीले रंग का बुर्क़ा पहना कर भेजता है, जिससे यह इशारा होता है कि जब चाँद डूब जाए और अँधेरा छा जाए तब आना।

     

    एना उपदेसा अलंकार

    किसी पर बात ढाल के कहना, मसलन एक वफ़ादार माशूक़ा का आशिक़ आया है, वह दूसरे शख़्स की तरफ़ मुख़ातिब होकर कहती है कि आह! आज मेरा शौहर एक काम को गया है, सास भी कहीं गई है, गाय-भैंस का बाँधना, मुझ पर किस क़दर भारी है और अँधेरी रात में मुझको सख़्त डर लगता है, लेकिन इन बातों का असली मुख़ातिब दरअसल आशिक़ है। उर्दू-फ़ारसी में इसकी मिसालें बड़ी संख्या में मिल सकती हैं, लेकिन लेखक ने जो मिसाल दी है, उससे हिंदुस्तान के पुराने रहन-सहन का अंदाज़ा होता है।

     

    अतिशयोक्त अलंकार

    इसकी चार क़िस्में हैं, यानी नगर जादा वसान, यानी मुशब्बाह बिही (जिससे उपमा दी जाए) का ज़िक्र करके मुशब्बाह (जिसकी उपमा दी जाए) मुराद लेते हैं, मसलन यह कि चाँद, साँप, हिरन, चीता, मेरा दिल उड़ा ले गए। रुख़्सार (गाल), ज़ुल्फ़, आँख, कमर को चाँद, साँप, हिरन और चीते से उपमा देते हैं, लेकिन इस जगह ख़ुद इन चीज़ों को बोल कर रुख़्सार वग़ैरह मुराद लिया है।

     

    ब्रिकतस्या नथाभान

    इसमें उपमा का ज़रा भी असर बाक़ी नहीं रहता, और न मुशब्बाह और मुशब्बाह बिही का ज़िक्र होता है, बल्कि मुशब्बाह से इनकार करके उसको बिल्कुल मुशब्बाह बिही मान लेते हैं। मसलन कहते हैं कि अब तुम वह नहीं रहे बल्कि दूसरी चीज़ हो गए।

     

    कारन कारज परजी

    इस अलंकार में नतीजा, कारण से पहले आता है। मसलन जुर्म सज़ा का कारण है, लेकिन यूँ कहते हैं, इस शहर में अजीब रस्म है कि गुनाह करने से पहले सज़ा देते हैं।

     

    जद्यारता

    इसमें मुशब्बाह को मुशब्बाह बिही पर तरजीह (प्राथमिकता) देते हैं, मसलन चाँद से माशूक़ को उपमा देते हैं, लेकिन अगर यूँ कहें कि चाँद माशूक़ के बराबर उस वक़्त हो सकता है जब उसके याक़ूत (लाल पत्थर) जैसे होंठ, मोती की तरह दाँत, साँप की तरह ज़ुल्फ़ और हिरन जैसी आँखें हों। अरबी और फ़ारसी में इसकी मिसालें बहुत ज़्यादा हैं।

     

    अछर चुथका अलंकार

    यानी सवाल-ओ-जवाब का अलंकार, फ़ारसी में यह अलंकार बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होता है, लेकिन भाषा में यह नयापन है कि लगातार सवाल किए जाते हैं, उसके बाद सिर्फ़ एक ऐसा अकेला लफ़्ज़ बोलते हैं जो सारे सवालों का जवाब होता है। मसलन इन सवालों के जवाब में कि ज़मीन और ज़माने की रोशनी, देखने की ताक़त, इंसान की रोज़ी का कारण क्या है? सिर्फ़ 'ऐन' का लफ़्ज़ काफ़ी होगा क्योंकि ऐन, सूरज, आँख, और सोने को कहते हैं और वह इन सवालों पर हावी है।

     

    भरमान अलंकार

    धोखे में पड़ना, मसलन यह कि मेरा दिल माशूक़ के तिल को दाना समझ कर उसकी ज़ुल्फ़ के जाल में जा फँसा। एक हिंदी शायर ने इस विषय को अजीब सुंदर अंदाज़ में अदा किया है। वह कहता है कि एक भौंरा तोते की चोंच को ढाक का फूल समझ कर रस चूसने के लिए उस पर जा बैठा, तोते ने उसको जामुन का फल समझा और निगल गया।

     

    इन अलंकारों में से हमने बहुत से छोड़ दिए, जिसकी वजह यह है कि अव्वल तो इनमें से बहुत से फ़ारसी और अरबी में बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होते हैं, दूसरे संस्कृत अल्फ़ाज़ का उच्चारण हमसे सही अदा नहीं होता। इस मौक़े पर यह नुक्ता ख़ास तौर पर ध्यान देने के क़ाबिल है कि हालाँकि हमारे लेखकों ने संस्कृत और ब्रज भाषा के साहित्य के नुक्ते-नुक्ते को समझा और उससे बहुत फ़ायदा उठाया, लेकिन इसके फ़ायदे से वही महरूम रह गया, जो सबसे ज़्यादा हक़दार था। यह ज़ाहिर है कि उर्दू भाषा से निकली और उसके दामन में पली, लेकिन भाषा से जो सरमाया उसको मिला, वह सिर्फ़ अल्फ़ाज़ थे, विषयों और ख़यालात से उसका दामन ख़ाली रहा। इसके विपरीत अरबी ज़बान जिसको भाषा से किसी क़िस्म की जान-पहचान न थी, उसने संस्कृत और भाषा दोनों से फ़ायदा उठाया। (तफ़्सील इसके आगे आएगी।)

     

    इसकी वजह यह हुई कि आज से 50 बरस पहले मुसलमान उर्दू को कोई इल्मी ज़बान नहीं समझते थे, ख़त-किताबत तक फ़ारसी में थी। उर्दू शायर जितने भी गुज़रे, उनमें से एक भी अरबी का विद्वान न था, या यूँ कहो कि कोई विद्वान उर्दू को इस क़ाबिल नहीं समझता था कि इसमें लेखन या शायरी का कमाल दिखाए। इल्मी ज़बान उस वक़्त सिर्फ़ अरबी थी। इसलिए जहाँ से जो सरमाया मिलता था, उसी के ख़ाने में जमा किया जाता था। बहरहाल हिंदी शायरी के विषय, अरबी ज़बान में हूबहू नक़ल हुए, यानी साहित्य के विद्वानों ने संस्कृत और भाषा की नज़्मों का हूबहू अरबी में तर्जुमा किया। हम चंद मिसालें नीचे लिखते हैं। यह मिसालें 'सुबहत-उल-मरजान' से ली गई हैं। मौलवी ग़ुलाम अली आज़ाद ने हर जगह स्पष्ट कर दिया है कि वह हिंदी से तर्जुमा की गई हैं।

     

    लक़द नहलत फ़ी यौम राज जीबहा

    इला अन हवा मिन साएदैहा नज़ारहा

     

    व लम्मा अमाहा मुख़बिर-अन क़ुदूमिहा

    अला साएद-इल-मल्आन ज़ाक़ा सिवारहा

     

    (यह याद रखना चाहिए कि हिंदी में आशिक़ औरत है और मर्द माशूक़ है।) यानी जिस दिन माशूक़ ने सफ़र किया मैं इस क़दर दुबली हो गई कि हाथ के कड़े ढीले होकर गिर पड़े, लेकिन जिस दिन क़ासिद ने आकर माशूक़ के आने की ख़बर दी और मैंने कड़ों को पहनना चाहा तो अब वह तंग हो गए और चढ़ते न थे।

     

    मा लाह फ़ी शफ़तैक कुहल राक़

    इन्नी अबीनह बे-हुस्न-ए-बयान

     

    ख़तमत् अला शफ़तैक ज़ात तदल्लुल

    कयला तुकल्लिमनी अलल अहयान

     

    वाक़िया यह है कि पति किसी और प्रेमिका से मिलकर आया है और चूँकि उसने उसकी सुरमई (काजल लगी) आँखों को चूमा था, इसलिए उसके होंठों पर स्याही लग गई। अब औरत पति से कहने आई है कि तेरे होंठों पर जो स्याही है, मैं बताऊँ क्यों है और कहाँ से आई है? किसी काफ़िर अदा ने तेरे होंठों पर मुहर लगा दी है कि तू कभी मुझसे बात न करे।

     

    रात अल-महात अल-आमरिया सदरा

    बिज़्ज़फ़र मकलुमन फ़क़ालत मरहबा

     

    हाज़ा हिलाल तुब्तग़ीह तबअती

    रूही फ़िदाक ला लअबा

     

    एक भोली कमसिन औरत ने अपने पति के सीने पर नाख़ून की खरोंच देखी जो नाख़ून के ही आकार की थी, भोलेपन से पति से कहती है कि यह तो नई रात का चाँद है, मुझे बहुत प्यारा लग रहा है, मुझे दे दो, मैं इससे खेलूँगी।

     

    यात अल-हुब्ब मअल हसनाए बारिहा

    हत्ता यदी हाजिब मिन आज़मिश शुहुब

     

    व रार ज़ौजतुहू फ़िस सुब्ह फ़नक़बज़त

    लम्मा रअत तरफ़हुल हुम्र कस-सबक

     

    क़ालत फ़तात लहा फ़िल ऐन मुनअकिस

    याक़ूत सीमक अन-नक़र अन लहब

     

    बसमत् मिन समाइल क़ौल वाज़िअतन

    फ़ज़ल अल-ख़िमार अला ज़ौइन मिनश-शनब

     

    फ़सार यग़ज़ब लिस-सहबाए कैफ़ ग़दत

    तुहल्ली रज़ा बिक व अज़वर्रत अनिल अदब

     

    क़ालत लहू ला तकुन ग़ज़बान मरहमतन

    फ़सत तरफ़क मुहम्मर अन-इल ग़ज़ब

     

    शोख़ी-ए-अदा, आरिफ़ाना तजाहुल (जान-बूझकर अनजान बनना) और ख़याल की नज़ाकत की इससे बेहतर मिसालें नहीं मिल सकतीं। और सिर्फ़ इन शेरों से अंदाज़ा हो सकता है कि भाषा (हिंदी) की शायरी किस क़दर लतीफ़ और नाज़ुक है। सूरत-ए-हाल यह है कि पति रात भर का जागा हुआ कहीं से आया है और उसकी आँखें लाल हैं, औरत को शक होता है कि किसी प्रेमिका के यहाँ रात गुज़ारी है, इसलिए आँखें लाल हैं। एक सहेली इस शक को मिटाना चाहती है और कहती है कि नहीं, यह तुम्हारे होंठों की लाली का अक्स (परछाईं) है। औरत शर्मा कर आँचल का कोना मुँह पर रख लेती है। (इससे असल में यह मक़सद है कि अगर होंठों की लाली थी, तो वह आँचल में छिप गई, अब क्यों लाली नज़र आती है।) पति ग़ुस्से की सूरत बनाकर कहता है कि शराब को क्या हक़ है जो तेरे होंठों के रस का मुक़ाबला करे, औरत कहती है आप ग़ुस्सा न हों, मैं समझी, आपकी आँखें ग़ुस्से की वजह से लाल हैं। उर्दू ज़बान में अगर इस लताफ़त (बारीकी) की कोई मिसाल है तो यह शेर है:

     

    न मैं समझा न आप आए कहीं से

    पसीना पोंछिए अपनी जबीं से

     

    जिस ज़माने में मौलवी ग़ुलाम आज़ाद बिलग्रामी औरंगाबाद दक्कन में थे, उनके मामूँ मौलाना तुफ़ैल अहमद ने बिलग्राम से एक हिंदी नज़्म अरबी में तर्जुमा करने के लिए भेजी। आज़ाद ने नीचे दिए गए तरीक़े से उसका तर्जुमा किया। (सुबहत-उल-मरजान पृ. 250)

     

    ज़ारत सुआद बिला वअद फ़क़ुल्तु लहा

    या मरहबा बिक मन अल्क़ाक फ़िन-नअब

     

    क़ालत लक़द जाअनी ग़ैम व कल्लफ़नी

    अन्नी अजूब इलैक अल-अर्ज़ बिल-हुदब

     

    फ़क़ुल्तु कैफ़ तवैत अल-अर्ज़ माशिया

    वक़्त अद-दुजा व सुकूब अद-दम्अ मिन सुहुब

     

    क़ालत हदानी शुआअ अल-बर्क़ मरहमतन

    फ़मिस्लहू सिरतु फ़िल क़ीआन वन-नतब

     

    फ़क़ुल्तु सैरुक फ़ी हुंजिद दुजा ग़लत

    बिला रफ़ीक़ शरीक फ़ी ख़ुतत तलब

     

    क़ालत ख़यालक तूलस सैर कान सई

    फ़ी हालत अन तुजाहिल ऐन लम यग़िब

     

    यानी माशूक़ा (प्रेमिका) मेरे पास अचानक आई, मैंने कहा ख़ैर है? इस वक़्त कैसे तकलीफ़ की? बोली कि बादल आ गए, उन्होंने मुझे आमादा किया (उकसाया) कि तेरे पास आऊँ। मैंने कहा रात और बादल के अँधेरे में रास्ता कैसे नज़र आया? बोली कि बिजली ने रहनुमा (गाइड) साथ कर दिया था। मैंने कहा, रात को अकेले सफ़र करना किसी तरह मुनासिब नहीं। बोली कि मैं तन्हा नहीं आई, तेरा ख़याल बराबर मेरे साथ रहा और साथ आया।

     

    ऊपर ज़िक्र किए गए वाक़ियात को पढ़कर एक दफ़ा और हमारे हिंदू दोस्त के वे अल्फ़ाज़ याद करो कि मुसलमानों ने कभी हिंदुस्तान के लिटरेचर से फ़ायदा नहीं उठाया। हम वे लोग हैं कि,

     

    हेच गह ज़ौक़-ए-तलब अज़ जुस्तुजू बाज़म न दाश्त

    दाना मी चीदम मन आँ रोज़े कि ख़िरमन दाश्तम

    मूल लेख पढ़िए :
    स्रोत :
    • रचनाकार :शिबली नोमानी
    • प्रकाशन : डायरेक्टर क़ौमी कौंसिल बरा-ए-फ़रोग़-ए-उर्दू ज़बान, नई दिल्ली

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