ग़ज़ल 24

शेर 27

मुझे ख़बर थी इस घर में कितने कमरे हैं

मैं कैसे ले के वहाँ सारी दास्ताँ जाता

क्या नहीं जानता मुझे कोई

क्या नहीं शहर में वो घर बाक़ी

झाँकते रात के गरेबाँ से

हम ने सौ आफ़्ताब देखे हैं

ई-पुस्तक 1

कू बा कू

 

1976

 

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