- पुस्तक सूची 182452
-
-
पुस्तकें विषयानुसार
-
गतिविधियाँ85
बाल-साहित्य1987
नाटक / ड्रामा925 एजुकेशन / शिक्षण343 लेख एवं परिचय1390 कि़स्सा / दास्तान1597 स्वास्थ्य105 इतिहास3285हास्य-व्यंग610 पत्रकारिता201 भाषा एवं साहित्य1709 पत्र743
जीवन शैली30 औषधि982 आंदोलन272 नॉवेल / उपन्यास4307 राजनीतिक354 धर्म-शास्त्र4754 शोध एवं समीक्षा6612अफ़साना2685 स्केच / ख़ाका244 सामाजिक मुद्दे109 सूफ़ीवाद / रहस्यवाद2038पाठ्य पुस्तक450 अनुवाद4246महिलाओं की रचनाएँ5827-
पुस्तकें विषयानुसार
- बैत-बाज़ी14
- अनुक्रमणिका / सूची4
- अशआर68
- दीवान1281
- दोहा48
- महा-काव्य101
- व्याख्या181
- गीत63
- ग़ज़ल1262
- हाइकु11
- हम्द55
- हास्य-व्यंग31
- संकलन1604
- कह-मुकरनी7
- कुल्लियात584
- माहिया20
- काव्य संग्रह4874
- मर्सिया387
- मसनवी748
- मुसद्दस44
- नात584
- नज़्म1205
- अन्य82
- पहेली15
- क़सीदा182
- क़व्वाली17
- क़ित'अ68
- रुबाई272
- मुख़म्मस15
- रेख़्ती12
- शेष-रचनाएं17
- सलाम34
- सेहरा12
- शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा17
- तारीख-गोई26
- अनुवाद74
- वासोख़्त25
अहमद अली की कहानियाँ
प्रेम कहानी
मोहब्बत का इज़हार करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना की मोहब्बत करना है। अगर आप इज़हार नहीं करेंगे तो अपने हाथों अपनी मोहब्बत का क़त्ल कर देंगे। यह कहानी भी एक ऐसे ही क़त्ल की दास्तान है। नायक एक लड़की से बे-पनाह मोहब्बत करता है। एक दिन वह उसके साथ एक साईकिल ट्रिप पर भी जाता है। मौसम बहुत खु़शगवार है लेकिन वह चाहने के बाद भी इज़हार नहीं कर पाता है। उसके इज़हार न करने के कारण लड़की उससे दूर हो जाती है और फिर कभी उसके पास नहीं आती है। हालांकि वह उससे बीच-बीच में मुलाक़ात करती है। मोहब्बत करने और उसका इज़हार न करने पर इंसान की क्या हालत होती है वह आप इस कहानी को पढ़ कर जान सकते हैं।
उसके बग़ैर
यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो बहार के मौसम में तन्हा बैठी अपने पहले प्यार को याद कर रही है। उन दिनों उसकी बहन के बहुत से चाहने वाले थे मगर उसका कोई प्रेमी नहीं था। और इसी बात का उसे अफ़सोस था। अचानक उसकी ज़िंदगी में आनंद आ गया और उसने उसकी पूरी ज़िंदगी ही बदल दी। उन्होंने मिलकर एक ट्रिप का प्लान बनाया। उस सफ़र में उन दोनों के साथ कुछ ऐसे हादसे हुए जिनकी वजह से वह उस सफ़र को कभी नहीं भूला सकी।
महावटों की एक रात
महावटों की रात है और घनघोर बरसात हो रही है। एक ग़रीब परिवार जिसमें तीन छोटे बच्चे भी हैं एक छोटे कमरे में सिमटे-सिकुड़े लेटे हुए हैं। घर की छत चू रही है। ठंड लग रही है और भूख से पेटों में चूहे कूद रहे हैं। बच्चों की अम्मी अपनी पुराने दिनों को याद करती है और सोचती है कि शायद वह जन्नत में है। जब बच्चे बार-बार उससे खाने के लिए कहते हैं तो वह उसके बारे में सोचती है और कहती है कि अगर वह होता तो कुछ न कुछ खाने के लिए लाता।
गुज़रे दिनों की याद
हमारी ज़िंदगी में कभी-कभी कोई ऐसा लम्हा आता है जो बीते दिनों की एक ऐसी खिड़की खोल देता है कि उससे यादों की पूरी बहार चली आती है। इस तरह कि हम चाहकर भी उनमें से अपनी मनचाही याद को नहीं चुन सकते। कहानी का नायक भी कुछ ऐसी ही कशमकश में उलझा हुआ है। वह घर में है कि अचानक फ़ोन की घंटी बजती है। सामने से आवाज़ आती है कि वह बताये कि यह आवाज़ किसकी है? नायक अपनी याददाश्त के अनुसार ढेर सारी लड़कियों के नाम लेता है लेकिन उस लड़की का नाम नहीं बता पाता जो उससे बात कर रही है। वह बहुत देर तक याद करने की कोशिश करता है कि आख़िर उससे बात करने वाली लड़की है कौन?
शादी
यह कहानी एक ऐसे शख़्स की है, जो पाँच साल तक पश्चिमी सभ्यता में पला-बढ़ा है। उसने वहाँ के साहित्य को पढ़ा और समाज में पूरी तरह रच बस गया है। जब वह हिंदुस्तान लौटता है तो परिवार वाले उसकी शादी करने के लिए कहते हैं मगर वह बिना देखे, मिले किसी लड़की से शादी करने पर राज़ी नहीं होता। तीन साल तक ना-नूकुर करने के बाद आख़िर-कार वह मान ही जाता है। शादी होने के बाद वह अनजान होने पर बीवी के पास जाने से कतराता है। फिर एक रात तन्हा लेटे हुए कुछ नॉवेल के हिस्से याद आते हैं और वह अपनी बीवी की चाहत में तड़प उठता है और उसके पास चला जाता है।
उस्ताद शम्मो ख़ाँ
यह कहानी उस्ताद शम्मो खाँ की है। एक ज़माने में वह पहलवान था। पहलवानी में उसने काफ़ी नाम कमाया था और अब अच्छी ख़ासी ज़िंदगी गुजार रहा था कि अब ज़िंदगी के बाक़ी दिन कबूतर-बाज़ी का शौक़ पूरा करके गुज़र रहा है। पास ही रहने वाले शेख जी भी कबूतर-बाज़ी का शौक़ रखते थे। अब कबूतर-बाज़ी के इस शौक़ में उन दोनों के बीच किस-किस तरह के दांव-पेंच होते हैं और कौन बाज़ी मारता है, यह सब जानने के लिए यह कहानी पढ़ें।
गु़लामी
पूंजीवाद ने हर ग़रीब इंसान को गु़लाम बना दिया है। एक खु़शगवार शाम में दो दोस्त नदी के किनारे बैठे हुए हैं और अपनी और ग़रीबों की स्थिति को लेकर बातें कर रहे हैं। वे इस बात से दुखी हैं कि ग़रीब कितने दुखों के साथ ज़िंदगी जीते हैं। शाम ढ़ल जाती है और वे वहाँ से चलने की तैयारी करते हैं। तभी एक ग़रीब औरत उनके पास से गुज़रती है। उनमें से एक उससे फ़स्ल के बारे में पूछता है तो जवाब में औरत रोने लगती है। उसका रोना देखकर एक दोस्त उसकी मदद करना चाहता, तो दूसरा यह कहकर उसे रोक देता है कि गु़लामी तो इनके अंदर बसी हुई है... मदद करने से कुछ नहीं होगा।
तस्वीर के दो रुख़
कहानी आज़ादी से पहले की दो तस्वीरें पेश करती है। एक तरफ पुराने रिवायती नवाब हैं, जो ऐश की ज़िंदगी जी रहे हैं, मोटर में घूमते हैं, मन बहलाने के लिए तवाएफ़ों के पास जाते हैं। साथ ही आज़ादी के लिए जद्द-ओ-जहद करने वालों को कोस रहे हैं। गांधी जी को गालियां दे रहे हैं। दूसरी तरफ आज़ादी के लिए मर-मिटने वाले नौजवान हैं जिनकी लाश को कोई कंधा देने वाला भी नहीं है।
क़ैदख़ाना
एक ऐसे शख़्स की कहानी, जो तन्हा है और वक़्त गुज़ारी के लिए हर रोज शाम को शराब-ख़ाने में जाता है। वहाँ अपने रोज़ के साथियों से उसकी बातचीत होती है और फिर वह पेड़ों के झुरमुट के पीछे छुपे अपने मकान में आ जाता है। मकान उसे किसी क़ैदख़ाने की तरह लगता है। वह मकान से निकल पड़ता है और क़ब्रिस्तान, पहाड़ियों और दूसरी जगहों से गुज़रते, लोगों के मिलते और उनके साथ वक़्त गुज़ारते हुए वह इस नतीजे पर पहुँचता है कि यह ज़िंदगी ही एक क़ैदख़ाना है।
मज़दूर
हमारा सभ्य समाज मज़दूरों को इंसान नहीं समझता। एक ग़रीब मज़दूर तबियत ठीक न होने के बावजूद मजबूरी में बिजली के खंबे पर चढ़कर लाइट ठीक कर रहा है कि अचानक उसका संतुलन बिगड़ जाता है और वह खम्बे से गिर जाता है और लहू-लुहान हो जाता है। किसी तरह उसे अस्पताल पहुँचाया जाता है। अभी उसकी साँसें चल रही हैं फिर भी अलसाया डॉक्टर उसे मृत घोषित कर देता है।
join rekhta family!
-
गतिविधियाँ85
बाल-साहित्य1987
-
