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फ़ैज़ झंझानवी
अशआर 17
तू बहर-ए-इश्क़ में दिल को हम-आग़ोश-ए-तलातुम रख
ये वो मोती है जो पर्वर्दा-ए-साहिल नहीं होता
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वो अगर शो'ला-ज़न-ए-दिल हों तो हुस्न-ए-इल्तिफ़ात
दिल अगर शिकवा-कुन-ए-सोज़-ए-दरूँ हो नंग है
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आओ ग़म-ए-पुर्सिश क्या मैं शिकवे से बाज़ आया
तुम चार क़दम पीछे क्यों हो सफ़-ए-महशर से
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ले कर अंगड़ाई उठी जब निगह-ए-हुस्न-ए-तलब
ज़र्रे ज़र्रे में उन्हें अंजुमन-आरा देखा
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सर-ए-जमशेद को ख़िश्त-ए-ख़ुम-ए-सहबा से टकरा दें
गदा-ए-मय-कदा भी किस क़दर मग़रूर होते हैं
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ग़ज़ल 17
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