- पुस्तक सूची 188917
-
-
पुस्तकें विषयानुसार
-
गतिविधियाँ77
बाल-साहित्य2091
नाटक / ड्रामा1036 एजुकेशन / शिक्षण392 लेख एवं परिचय1559 कि़स्सा / दास्तान1788 स्वास्थ्य109 इतिहास3612हास्य-व्यंग759 पत्रकारिता220 भाषा एवं साहित्य1982 पत्र825
जीवन शैली29 औषधि1053 आंदोलन299 नॉवेल / उपन्यास5062 राजनीतिक376 धर्म-शास्त्र5061 शोध एवं समीक्षा7454अफ़साना3035 स्केच / ख़ाका293 सामाजिक मुद्दे121 सूफ़ीवाद / रहस्यवाद2302पाठ्य पुस्तक573 अनुवाद4623महिलाओं की रचनाएँ6309-
पुस्तकें विषयानुसार
- बैत-बाज़ी14
- अनुक्रमणिका / सूची5
- अशआर70
- दीवान1491
- दोहा53
- महा-काव्य106
- व्याख्या214
- गीत68
- ग़ज़ल1396
- हाइकु12
- हम्द55
- हास्य-व्यंग37
- संकलन1680
- कह-मुकरनी7
- कुल्लियात725
- माहिया21
- काव्य संग्रह5427
- मर्सिया406
- मसनवी899
- मुसद्दस62
- नात613
- नज़्म1326
- अन्य83
- पहेली16
- क़सीदा203
- क़व्वाली18
- क़ित'अ74
- रुबाई307
- मुख़म्मस16
- रेख़्ती13
- शेष-रचनाएं27
- सलाम36
- सेहरा12
- शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा20
- तारीख-गोई31
- अनुवाद74
- वासोख़्त29
मुल्ला रमूज़ी का परिचय
LCCN :no99036852
मुल्ला रमूज़ी गुलाबी उर्दू के आविष्कारक के रूप में हमारे अदब में पहचाने जाते हैं। ख़ुद उनके शब्दों में गुलाबी उर्दू का मतलब ये है कि वाक्य में शब्दों के क्रम को बदल दिया जाए। जैसे ये कि पहले क्रिया फिर कर्ता और कर्म। इस तरह अरबी से उर्दू अनुवाद का अंदाज़ पैदा होजाता है। बेशक यह लुत्फ़ देता है लेकिन ज़रा देर बाद पाठक उकता जाता है।
मुल्ला रमूज़ी का असल नाम सिद्दीक़ इरशाद था। भोपाल में 1896ई. में पैदा हुए। ये उनका पैतृक स्थान नहीं था। उनके पिता और चचा काबुल (अफ़ग़ानिस्तान) से आकर भोपाल में रहने लगे। दोनों विद्वान थे इसलिए उच्च नौकरियों से नवाज़े गए। सिद्दीक़ इरशाद उर्दू, फ़ारसी, अरबी की आरंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद कानपुर के मदरसा इलाहियात में दाख़िल हुए। उसी ज़माने में लेख लिखने का शौक़ हुआ। उनके लेख मानक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए। अब उन्होंने अपना क़लमी नाम मुल्ला रमूज़ी रख लिया और साहित्य की दुनिया में इसी नाम से मशहूर हुए।
देश में स्वतंत्रता आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा तो मुल्ला रमूज़ी उससे प्रभावित हुए बिना न रह सके। राजनीतिक मुद्दों पर अच्छी नज़र थी। सरकार के ख़िलाफ़ हास्यप्रद लेख लिखने लगे जिन्हें पसंद किया गया। कई पत्रिकाओं ने उन्हें संपादक बनाकर गौरवान्वित किया। उसके बाद वहीदिया टेक्नीकल स्कूल में अध्यापक हो गए। सन्1952 में उनका निधन हुआ।
मुल्ला रमूज़ी गद्यकार होने के साथ साथ शायर व वक्ता भी थे। उनके पास प्रशासनिक क्षमता भी थी। इससे फ़ायदा उठाते हुए, शिक्षा व साहित्य के प्रचार प्रसार के लिए उन्होंने कई संस्थाएं स्थापित कीं लेकिन उनकी असल प्रसिद्धि गुलाबी उर्दू पर है जिसके वे आविष्कारक हैं। उनकी यह निराले रंग की किताब “गुलाबी उर्दू” के नाम से 1921ई. में प्रकाशित हुई। उसे सामान्य स्वीकृति मिली लेकिन वो जानते थे कि यह स्वीकृति स्थायी नहीं सामयिक है। इसलिए उन्होंने राजनीति को अपना स्थायी विषय बनाया और सादा व सरल भाषा को अपनाया। हास्य-व्यंग्य स्वभाव में था, इसलिए सादगी में भी हास्य का हल्का हल्का रंग बरक़रार रहा, उसे पसंद किया गया।
वह लिखते हैं कि मेरे लेखों की कोई अहमियत है तो सिर्फ इसलिए कि “मैं हक़ीक़त का दामन नहीं छोड़ता।” सरकार के अत्याचार, सामाजिक अन्याय और सामाजिक बुराइयाँ उन्हें मजबूर करते हैं कि जो कुछ लिखें हास्य की आड़ में लिखें। नतीजा ये कि दिलचस्पी में इज़ाफ़ा हो जाता है।स्रोत : Tareekh-e-Adab-e-Urduसंबंधित टैग
प्राधिकरण नियंत्रण :लाइब्रेरी ऑफ कॉंग्रेस नियंत्रण संख्या : no99036852
join rekhta family!
-
गतिविधियाँ77
बाल-साहित्य2091
-
