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क़मर रईस बहराइची
अशआर 5
अपनों के दरमियाँ भी घुटन से लगी मुझे
रिश्तों की जुस्तुजू ये कहाँ ले के आ गई
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मैं कैसे मान लूँ वो मसीहा-ए-वक़्त है
किरदार उस का लाएक़-ए-दस्तार भी नहीं
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पर्दा-ए-शब से निकलने का नहीं लेता नाम
आज सूरज ही सवेरा नहीं होने देता
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रोया तमाम उम्र वो शबनम के साथ साथ
फिर क्यों कहूँ कि दर्द-ए-गुल-ए-तर में कुछ न था
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मेरा क़ातिल जो मिरे ख़ून से तर लगता है
सर उठाए तो है शर्मिंदा मगर लगता है
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ग़ज़ल 10
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