रासिख़ दहलवी के शेर
'रासिख़' की फ़ाक़ा-मस्ती से अल्लाह की पनाह
खाता है सूखे टुकड़े भिगो कर शराब में
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere