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Shaikh Ahmad Sarhindi's Photo'

शेख अहमद सरहिन्दी

1564 - 1624 | सरहिंद, भारत

महान धर्म सुधारक, सूफी, मुजद्दिद-ए-अल्फ-ए-सानी और इमाम-ए-रब्बानी के नाम से प्रसिद्ध

महान धर्म सुधारक, सूफी, मुजद्दिद-ए-अल्फ-ए-सानी और इमाम-ए-रब्बानी के नाम से प्रसिद्ध

शेख अहमद सरहिन्दी का परिचय

मूल नाम : शेख अहमद सरहिन्दी

जन्म : 26 May 1564 | सरहिंद, पंजाब

निधन : 29 Nov 1624 | सरहिंद, पंजाब

पहचान: महान धार्मिक सुधारक, सूफ़ी संत, मुजद्दिद-ए-अल्फ़-ए-सानी और इमाम-ए-रब्बानी

शेख अहमद सरहंदी भारतीय उपमहाद्वीप के उन महान उलेमा और सूफ़ियों में गिने जाते हैं जिन्होंने इस्लामी विचार, तसव्वुफ़ और दीन की इस्लाह के क्षेत्र में असाधारण सेवाएँ दीं। वे “मुजद्दिद-ए-अल्फ़-ए-सानी” और “इमाम-ए-रब्बानी” के ख़िताब से मशहूर हैं।

शेख अहमद बिन अब्दुल अहद बिन ज़ैनुल आबिदीन का जन्म 14 शव्वाल 971 हिजरी / 26 मई 1564 ई. को सरहिंद (वर्तमान पंजाब, भारत) में एक धार्मिक और सूफ़ी परिवार में हुआ। उनके पिता शेख अब्दुल अहद एक बड़े सूफ़ी बुज़ुर्ग थे, जिनसे उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद अजमेर और सियालकोट में मौलाना कमालुद्दीन कश्मीरी और मौलाना याक़ूब कश्मीरी जैसे विद्वानों से उच्च शिक्षा हासिल की। कम उम्र में ही उन्होंने क़ुरआन, हदीस, फ़िक़्ह, तर्कशास्त्र और दर्शन में दक्षता प्राप्त कर ली।

उनका समय मुग़ल बादशाह अकबर के दौर से संबंधित था, जब “दीन-ए-इलाही” और धार्मिक मिश्रण की प्रवृत्तियाँ इस्लामी पहचान को प्रभावित कर रही थीं। ऐसे नाज़ुक दौर में शेख अहमद सरहंदी ने इस्लाम की मूल शिक्षाओं की रक्षा और पुनर्जीवन के लिए बौद्धिक और आध्यात्मिक संघर्ष किया। उन्होंने आस्था की शुद्धि, बिदअत के खंडन और सुन्नत के पुनर्जीवन पर ज़ोर दिया।

तसव्वुफ़ के क्षेत्र में उनका सबसे बड़ा योगदान “वहदत-उल-वजूद” की गलत व्याख्याओं की सुधार और “वहदत-उश-शहूद” के सिद्धांत की प्रस्तुति है, जिसके माध्यम से उन्होंने तसव्वुफ़ को शरीअत के अधिक निकट किया। उनके अनुसार तसव्वुफ़ की असली बुनियाद शरीअत है और शरीअत के बिना कोई आध्यात्मिकता मान्य नहीं।

वे नक्शबंदी सिलसिले से संबंधित थे और उनके गुरु हज़रत बाक़ी बिल्लाह देहलवी थे। उन्होंने अपने “मकतूबात” के माध्यम से आम लोगों और शासकों दोनों तक सुधार का संदेश पहुँचाया। बादशाह जहाँगीर के समय उन्हें क़ैद भी किया गया, लेकिन बाद में उनकी महानता को स्वीकार किया गया।

उनकी प्रसिद्ध पुस्तक “मकतूबात-ए-इमाम-ए-रब्बानी” तीन खंडों में है, जिसमें आस्था, तसव्वुफ़, फ़िक़्ह और नैतिकता पर गहन विचार मिलते हैं। उनके विचारों ने शाह वलीउल्लाह देहलवी जैसे बाद के विद्वानों को भी प्रभावित किया।

उनकी शिक्षा का सार यह है कि शरीअत और तसव्वुफ़ एक-दूसरे से अलग नहीं बल्कि परस्पर जुड़े हुए हैं। उनका प्रसिद्ध कथन है:
“तरीक़त बिना शरीअत के निरर्थक है, और शरीअत बिना तरीक़त के अधूरी।”

निधन: 28 सफ़र 1034 हिजरी / 10 दिसंबर 1624 ई. को सरहिंद शरीफ़ में उनका निधन हुआ।

 

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