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Syed Masood Hasan Rizvi Adeeb's Photo'

सय्यद मसूद हसन रिज़वी अदीब

1893 - 1975 | लखनऊ, भारत

आलोचक, शोधकर्ता, भाषाविद्, अपनी पुस्तक 'हमारी शायरी' के लिए मशहूर

आलोचक, शोधकर्ता, भाषाविद्, अपनी पुस्तक 'हमारी शायरी' के लिए मशहूर

सय्यद मसूद हसन रिज़वी अदीब का परिचय

उपनाम : 'अदीब'

मूल नाम : मोहम्मद मसूद

जन्म : 29 Jul 1893 | बहराइच, उत्तर प्रदेश

निधन : 29 Nov 1975 | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

संबंधी : नैयर मसूद (बेटा), तिमसाल मसऊद (पोता)

LCCN :n84206583

पुरस्कार : साहित्य अकादमी अवार्ड(1959)

पहचान: प्रमुख आलोचक, शोधकर्ता, भाषाविद् और उर्दू साहित्य के महत्वपूर्ण चिंतक

मसूद हसन रिज़वी अदीब उर्दू साहित्य के उन प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते हैं जिन्होंने आलोचना, शोध, भाषाविज्ञान और संपादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे विशेष रूप से अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "हमारी शायरी" के कारण उर्दू आलोचना के इतिहास में एक सम्मानित और प्रामाणिक स्थान रखते हैं। उनकी रचनाओं में गहराई, तार्किकता और संतुलित दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

मसूद हसन रिज़वी अदीब का जन्म 29 जुलाई 1893 को बहराइच (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका परिवार विद्वता और चिकित्सा परंपरा से जुड़ा हुआ था। उनके पिता हकीम सैयद मुर्तज़ा हुसैन एक प्रसिद्ध वैद्य और विद्वान थे। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता की देखरेख में प्राप्त की, लेकिन बचपन में ही पिता के निधन ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। वे स्वयं लिखते हैं कि यदि यह घटना न हुई होती तो वे अरबी के विद्वान बनते, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें उर्दू साहित्य की ओर मोड़ दिया।

उन्होंने मिडिल की शिक्षा उन्नाव से प्राप्त की और फिर लखनऊ के हुसैनाबाद स्कूल से हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में पास किया। इसके बाद किंग कॉलेज, लखनऊ से इंटरमीडिएट और बी.ए. किया। 1925 में उन्होंने फारसी में एम.ए. विशेष योग्यता के साथ पूरा किया। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक सरकारी हाई स्कूल से की, लेकिन जल्द ही लखनऊ विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग से जुड़ गए। 1930 में वे उर्दू और फारसी विभाग के अध्यक्ष बने और 1953 में प्रोफेसर के पद पर पहुंचे। 1954 में सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें यूजीसी के अंतर्गत रिसर्च प्रोफेसर नियुक्त किया गया।

छात्र जीवन से ही उन्हें साहित्य में गहरी रुचि थी और उन्हें मिर्ज़ा मोहम्मद हादी रुसवा, आरज़ू लखनवी और चकबस्त जैसे विद्वानों की संगति मिली। प्रारंभ में उन्होंने अनुवाद कार्य भी किया और एक नाटक का अनुवाद "इम्तिहान-ए-वफ़ा" नाम से प्रकाशित किया।

साहित्यिक रूप से वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व थे—आलोचक, शोधकर्ता, भाषाविद् और अनुवादक। उनकी प्रमुख कृतियों में हमारी शायरी, रूह-ए-अनीस, उर्दू ड्रामा और स्टेज, दास्तान-ए-उर्दू, फरहंग-ए-अम्साल, आईना-ए-ज़बान, उर्दू ज़बान और उसका रस्मुल ख़त, लखनऊ का शाही स्टेज, लखनऊ का सार्वजनिक स्टेज, तन्क़ीद-ए-कलाम-ए-ग़ालिब, अनीसियात, गुलशन-ए-सुखन आदि शामिल हैं।

उनकी पुस्तक "हमारी शायरी" उर्दू आलोचना में एक मील का पत्थर मानी जाती है। यह पुस्तक हाली की "मुक़द्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी" के कुछ पहलुओं की पूर्ति के रूप में लिखी गई, जिसमें उन्होंने उर्दू कविता के सौंदर्य पक्ष को सामने रखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य हाली से असहमति नहीं, बल्कि चित्र का दूसरा पक्ष प्रस्तुत करना है।

शोध के क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने लखनऊ के रंगमंच, मर्सिया, ग़ालिब अध्ययन और क्लासिकी उर्दू साहित्य पर उल्लेखनीय कार्य किया। गोपीचंद नारंग के अनुसार उन्होंने उर्दू कविता से जुड़ी कई गलतफहमियों को दूर किया और उनकी शोध दिशा-निर्देशक मानी जाती है।

वे एक विनम्र, सौम्य और उच्च चरित्र के व्यक्ति थे। उनकी विद्वता के साथ उनकी सादगी और विनम्रता भी उतनी ही प्रभावशाली थी, जिसके कारण वे सभी वर्गों में लोकप्रिय रहे।

निधन: 29 नवंबर 1975 को लखनऊ में हुआ।

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