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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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दो पल के हैं ये सब मह ओ अख़्तर न भूलना

अजमल अजमली

दो पल के हैं ये सब मह ओ अख़्तर न भूलना

अजमल अजमली

दो पल के हैं ये सब मह अख़्तर भूलना

सूरज ग़ुरूब होने का मंज़र भूलना

कितनी तवील क्यूँ हो बातिल की ज़िंदगी

हर रात का है सुब्ह मुक़द्दर भूलना

यादों के फूल घर से उठा कर चले तो हो

देखो इन्हें किसी जगह रख कर भूलना

माँ ने लिखा है ख़त में जहाँ जाओ ख़ुश रहो

मुझ को भले याद करो घर भूलना

हक़ पर अगर चलोगे तो हर आड़े वक़्त में

तुम को पनाह देगी ये चादर भूलना

स्रोत :
  • पुस्तक : Urdu International (पृष्ठ 146)
  • रचनाकार : Ashfaq Hussain
  • प्रकाशन : 1296, Bloor Street West Toronto, Ontario, Canada ((Janury -April 1986))
  • संस्करण : (Janury -April 1986)

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