ज़मीं ग़ुबार समुंदर सहाब अपनी जगह

इशरत ज़फ़र

ज़मीं ग़ुबार समुंदर सहाब अपनी जगह

इशरत ज़फ़र

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    ज़मीं ग़ुबार समुंदर सहाब अपनी जगह

    मगर मैं और मिरा इज़्तिराब अपनी जगह

    हवा की ज़द में है हर चीज़ ख़ार-ओ-ख़स की तरह

    कहो पड़े रहें चुप-चाप ख़्वाब अपनी जगह

    अगरचे बिखरी है राख उस की मेरे चारों तरफ़

    वो लम्हा अब भी है अपना जवाब अपनी जगह

    मिरे अक़ब में है आवाज़ा-ए-नुमू की गूँज

    है दश्त-ए-जाँ का सफ़र कामयाब अपनी जगह

    ज़बाँ को देता है एहसास-ए-तिश्नगी से नजात

    वो ज़ाइक़ा है सुकूत-ए-सराब अपनी जगह

    जाने होगा कहाँ ख़ेमा-ए-बदन 'इशरत'

    कि छोड़ने को है हर इक तनाब अपनी जगह

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