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पहचान: महान इस्लामी चिंतक, आलिम-ए-दीन, क़ुरआन के व्याख्याकार, इतिहासकार, दाई, लेखक और जीवनीकार
मौलाना अबुल हसन अली हसनी नदवी (जन्म: 24 नवंबर 1914, तकिया कलां, ज़िला रायबरेली, उत्तर प्रदेश) जिन्हें अली मियां के नाम से जाना जाता है, सैयदों के प्रसिद्ध हसनी वंश से संबंध रखते थे, जो हज़रत इमाम हसन (रज़ि.) तक पहुँचता है। उनके पूर्वजों में शाह इल्मुल्लाह और सैयद अहमद शहीद जैसी महान हस्तियाँ शामिल हैं। उनके पिता मौलाना अब्दुल हई हसनी एक प्रतिष्ठित आलिम थे और आठ खंडों में लिखी गई प्रसिद्ध अरबी जीवनी-कोश नुज़हतुल ख़वातिर के लेखक थे, जो उपमहाद्वीप की सदियों पुरानी इस्लामी विद्वत्ता का अमूल्य दस्तावेज़ है।
मौलाना अली मियां बीसवीं सदी की उन बहुआयामी इस्लामी शख़्सियतों में शामिल हैं जिन्होंने ज्ञान, दावत, विचार और लेखन के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय सेवाएँ दीं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा घर पर उर्दू, फ़ारसी और अरबी में हुई। इसके बाद उन्होंने दारुल उलूम नदवतुल उलमा, लखनऊ से इस्लामी उलूम में सर्वोच्च डिग्री प्राप्त की। अरबी भाषा और साहित्य में उनकी दक्षता प्रतिष्ठित शिक्षकों और गहन अध्ययन का परिणाम थी। उन्होंने हदीस की शिक्षा मौलाना हैदर हसन ख़ान टोंकी से और क़ुरआन का अध्ययन मौलाना अहमद अली लाहौरी से किया।
1934 में उन्हें नदवतुल उलमा में तफ़सीर और साहित्य के अध्यापक के रूप में नियुक्त किया गया। आगे चलकर वे उप-निदेशक शिक्षा और फिर निदेशक शिक्षा बने। 1961 में उन्हें नदवतुल उलमा का नाज़िम (रेक्टर) नियुक्त किया गया। मौलाना मुहम्मद इलियास (रह.) की संगत से उनके अंदर दावत और तबलीग़ का जज़्बा और मज़बूत हुआ। 1954 में उन्होंने पयाम-ए-इंसानियत आंदोलन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य मानवीय मूल्यों, नैतिक चेतना और इस्लाम के सार्वभौमिक संदेश का प्रसार था।
मौलाना अली मियां अरबी और उर्दू के विपुल लेखक थे। उनकी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक माज़ा ख़सिरल आलम बि इन्क़िह़ातिल मुसलिमीन (इंसानी दुनिया पर मुसलमानों के उत्थान और पतन का प्रभाव) ने इस्लामी जगत में वैचारिक जागरूकता पैदा की। इस पुस्तक की भूमिका सैयद क़ुत्ब ने लिखी थी। उनकी रचनाएँ इतिहास, दावत, सीरत, इस्लामी चिंतन और सभ्यतागत विषयों को समेटे हुए हैं और उनकी संख्या सैकड़ों में है।
वे कई अंतरराष्ट्रीय इस्लामी संस्थाओं से जुड़े रहे—ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अध्यक्ष, अंतरराष्ट्रीय इस्लामी साहित्य संघ के अध्यक्ष और राबिता आलम-ए-इस्लामी के संस्थापक सदस्य रहे। उनका व्यक्तित्व संतुलन, व्यापक दृष्टि और मस्लकी सौहार्द का प्रतीक था।
मौलाना अली मियां सादगी, संयम और आध्यात्मिकता के प्रतीक थे। उन्होंने अनेक पीढ़ियों की बौद्धिक और नैतिक तरबियत की। उनकी सेवाओं के सम्मान में उन्हें किंग फ़ैसल अवार्ड और दुबई अंतरराष्ट्रीय क़ुरआन पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्रदान किए गए।
उनका निधन 22 रमज़ान 1420 हिजरी, अर्थात 31 दिसंबर 1999 को हुआ और उन्हें तकिया रायबरेली के पारिवारिक क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।