aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
सुहा मुजद्ददी, सय्यद मुम्ताज़ हुसैन (1892-1947)मिर्ज़ा‘ग़ालिब’ के कलाम की व्याख्या करने के लिए मश्हूर। उनका क़द कोई साढ़े तीन फ़िटका था जिसपर लोग हंसा करते थे लेकिन प्रकृति के इस ज़ुल्म का बदला उन्होंने अपने ज्ञान और विद्वता का क़द ऊँचा कर के लिया। भोपाल में पैदा हुए और ज़िन्दगी भर वहीं रहे। जवानी में आशिक-मिज़ाजथे और तवाइफ़ों के कोठों पर भी आना जाना था।