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पहचान: मुफ़स्सिर, फ़क़ीह, मुफ़्ती-ए-आज़म
मुफ्ती मोहम्मद शफी एक महान मुफ़स्सिर, उच्च कोटि के फ़क़ीह, बे-मिसाल शोधकर्ता और सूफ़ी मार्ग के पूर्ण शैख़ थे, जिनकी शख्सियत इल्म और अमल का सुंदर संगम थी।
उनका जन्म 20/21 शाबान 1314 हिजरी (1897) की रात देवबंद में हुआ। उनके पिता मौलाना मोहम्मद यासीन देवबंदी एक बड़े आलिम और धार्मिक व्यक्ति थे।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा दारुल उलूम देवबंद में प्राप्त की। क़ुरआन की शिक्षा हाफ़िज़ मोहम्मद अज़ीम से ली और फ़ारसी व अन्य विषय अपने पिता से सीखे। बाद में उच्च शिक्षा के लिए दारुल उलूम के अरबी विभाग में दाखिला लिया और 1335 हिजरी में शिक्षा पूर्ण की।
उनके शिक्षकों में अनवर शाह कश्मीरी, शब्बीर अहमद उस्मानी, अज़ीज़ुर्रहमान उस्मानी और अन्य महान विद्वान शामिल थे।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने दारुल उलूम देवबंद में अध्यापन शुरू किया और जल्द ही प्रमुख शिक्षकों में गिने जाने लगे। उन्होंने लगभग 27 वर्षों तक पढ़ाया और हज़ारों विद्यार्थियों को लाभ पहुँचाया।
बाद में उन्हें दारुल उलूम में दारुल-इफ़्ता की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जहाँ उन्होंने कठिन फ़िक़्ही मसलों का समाधान किया।
उन्होंने पहले महमूद हसन से बैअत की, फिर अशरफ अली थानवी से जुड़े, जिन्होंने उन्हें ख़िलाफ़त दी।
उनकी प्रमुख रचनाओं में शामिल हैं:
मारिफ़ुल क़ुरआन (8 भागों में), इस्लाम का निज़ाम-ए-अरज़ी, ख़त्म-ए-नबुव्वत कामिल, सीरत ख़ातिमुल अंबिया, जवाहरुल फ़िक़्ह, फ़तावा दारुल उलूम देवबंद, अज़ीज़ुल फ़तावा।
इनमें मारिफ़ुल क़ुरआन उर्दू की बेहतरीन तफ़सीरों में से एक मानी जाती है।
पाकिस्तान बनने के बाद वे कराची चले गए और इस्लामी व्यवस्था तथा धार्मिक शिक्षा के प्रसार में योगदान दिया।
उन्होंने दारुल उलूम कराची की स्थापना की, जो आज एक महत्वपूर्ण संस्थान है।
निधन: 9/10 शव्वाल 1396 हिजरी (5/6 अक्टूबर 1976) को कराची में हुआ।