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पहचान: हकीम, सूफ़ी चिकित्सक, लेखक (अठारहवीं सदी)
शाह मोहम्मद अरज़ानी देहलवी, जिनका मूल नाम मुहम्मद अकबर बिन मीर हाजी मुहम्मद मुक़ीम अरज़ानी था, मुग़ल भारत के अठारहवीं सदी के एक प्रमुख फ़ारसी हकीम और सूफ़ी चिकित्सक थे। सत्रहवीं सदी के अंतिम दौर और अठारहवीं सदी की शुरुआत में वे दिल्ली और उसके आसपास यूनानी चिकित्सा के एक विश्वसनीय और सम्मानित नाम माने जाते थे।
उन्होंने चिकित्सा पर कई महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक क़राबादीन-ए-क़ादिरी है, जो दवाओं का एक संग्रह (फार्माकोपिया) है। इसे उन्होंने क़ादरी सूफ़ी सिलसिले के संस्थापक हज़रत सय्यद अब्दुल क़ादिर जीलानी के नाम से जोड़ा, क्योंकि वे स्वयं भी इसी सूफ़ी परंपरा से जुड़े हुए थे।
अरज़ानी ने शुरुआती विद्यार्थियों के लिए सरल और उपयोगी चिकित्सा पुस्तक मुफर्रह-उल-क़ुलूब लिखी। इसी तरह उन्होंने जघमिनी की क़ानून्चह पर टीका लिखी, जो वास्तव में इब्ने सीना की मशहूर किताब अल-क़ानून फ़ि-तिब्ब का संक्षिप्त रूप है।
उनकी एक अहम कृति तिब्ब-ए-अकबरी (1700 ई.) है, जो बुरहानुद्दीन नफ़ीस बिन अवज़ किरमानी की अरबी पुस्तक शरह अल-असबाब वल-अलामात का विस्तृत फ़ारसी रूप है।
इसके अलावा उन्होंने गर्भावस्था, स्तनपान के दौर की बीमारियों और बच्चों के रोगों पर भी अलग फ़ारसी ग्रंथ लिखा, जबकि मुजर्रबात-ए-अकबरी के नाम से आज़माए हुए मिश्रित नुस्ख़ों का संग्रह तैयार किया। शाह मोहम्मद अरज़ानी देहलवी चिकित्सा और सूफ़ी विचारधारा के सुंदर मेल की प्रतिनिधि शख़्सियत थे।
निधन: शाह मोहम्मद अरज़ानी देहलवी का देहांत 1133 हिजरी / 1721 ईस्वी में हुआ।