कहता है बाग़बान लिहाज़ा न चाहिए

शाद आरफ़ी

कहता है बाग़बान लिहाज़ा न चाहिए

शाद आरफ़ी

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    कहता है बाग़बान लिहाज़ा चाहिए

    वर्ना चमन का हाल छुपाना चाहिए

    इस मशवरा के साथ कि चर्चा चाहिए

    दिल कह रहा है उन पे भरोसा चाहिए

    पड़ जाए ख़द्द-ओ-ख़ाल-ए-मनाज़िर पे रौशनी

    इतने क़रीब से भी नज़ारा चाहिए

    हम ग़ौर कर रहे हैं तो महफ़िल है फ़िक्र में

    उठना चाहिए कि उठाना चाहिए

    दस्तूर है गुज़ारिश-ए-अहवाल-ए-वाक़ई

    क़ानून ये नहीं है कि शिकवा चाहिए

    तूफ़ान-ए-इंक़लाब से मायूसियों के ब'अद

    कश्ती पुकारती है किनारा चाहिए

    गुल-हा-ए-रंग-रंग में ठनती नहीं कभी

    हम को भी इस लिहाज़ से झगड़ा चाहिए

    कटती है आरज़ू के सहारे पे ज़िंदगी

    कैसे कहूँ किसी की तमन्ना चाहिए

    मेरा क़ुसूर ये है कि हुब्ब-ए-वतन में 'शाद'

    लिखता हूँ लिख चुका हूँ जो लिखना चाहिए

    स्रोत:

    • पुस्तक : mahvar (पृष्ठ 83)
    • रचनाकार : narendar nashchal
    • प्रकाशन : kohi noor paress lalkunvan delhi

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