नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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    नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

    नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

    तन में ख़ून फ़राहम अश्क आँखों में

    नमाज़-ए-शौक़ तो वाजिब है बे-वज़ू ही सही

    किसी तरह तो जमे बज़्म मय-कदे वालो

    नहीं जो बादा-ओ-साग़र तो हाव-हू ही सही

    गर इंतिज़ार कठिन है तो जब तलक दिल

    किसी के वादा-ए-फ़र्दा की गुफ़्तुगू ही सही

    दयार-ए-ग़ैर में महरम अगर नहीं कोई

    तो 'फ़ैज़' ज़िक्र-ए-वतन अपने रू-ब-रू ही सही

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    नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही आबिदा परवीन

    स्रोत:

    • पुस्तक : Nuskha Hai Wafa (पृष्ठ 696)

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