तुम को हम ख़ाक-नशीनों का ख़याल आने तक

क़मर जलालवी

तुम को हम ख़ाक-नशीनों का ख़याल आने तक

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    तुम को हम ख़ाक-नशीनों का ख़याल आने तक

    शहर तो शहर बदल जाएँगे वीराने तक

    देखिए महफ़िल-ए-साक़ी का नतीजा क्या हो

    बात शीशे की पहुँचने लगी पैमाने तक

    उस जगह बज़्म साक़ी ने बिठाया है हमें

    हाथ फैलाएँ तो जाता नहीं पैमाने तक

    सुब्ह होती नहीं इश्क़ ये कैसी शब है

    क़ैस फ़रहाद के दोहरा लिए अफ़्साने तक

    फिर तूफ़ान उठेंगे गिरेगी बिजली

    ये हवादिस हैं ग़रीबों ही के मिट जाने तक

    मैं ने हर-चंद बला टालनी चाही लेकिन

    शैख़ ने साथ छोड़ा मिरा मय-ख़ाने तक

    वो भी क्या दिन थे कि घर से कहीं जाते ही थे

    और गए भी तो फ़क़त शाम को मय-ख़ाने तक

    मैं वहाँ कैसे हक़ीक़त को सलामत रक्खूँ

    जिस जगह रद्द-ओ-बदल हो गए अफ़्साने तक

    बाग़बाँ फ़स्ल-ए-बहार आने पे वा'दा तो क़ुबूल

    और अगर हम रहे फ़स्ल-ए-बहार आने तक

    और तो क्या कहूँ शैख़ तिरी हिम्मत पर

    कोई काफ़िर ही गया हो तिरे मय-ख़ाने तक

    'क़मर' शाम का वा'दा है वो आते होंगे

    शाम कहलाती है तारों के निकल आने तक

    क़मर सुब्ह हुई अब तो उठो महफ़िल से

    शम्अ' गुल हो गई रुख़्सत हुए परवाने तक

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    क़मर जलालवी

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    स्रोत :
    • पुस्तक : Auj-Qamar (पृष्ठ 104)
    • रचनाकार : Ustad Sayed Mohd. Hussain Qamar Jalalvi
    • प्रकाशन : Shaikh Shokat Ali And Sons (1952)
    • संस्करण : 1952

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