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एक मकड़ा और मक्खी

अल्लामा इक़बाल

एक मकड़ा और मक्खी

अल्लामा इक़बाल

MORE BYअल्लामा इक़बाल

    रोचक तथ्य

    بانگ درا

    इक दिन किसी मक्खी से ये कहने लगा मकड़ा

    इस राह से होता है गुज़र रोज़ तुम्हारा

    लेकिन मिरी कुटिया की जागी कभी क़िस्मत

    भूले से कभी तुम ने यहाँ पाँव रक्खा

    ग़ैरों से मिलिए तो कोई बात नहीं है

    अपनों से मगर चाहिए यूँ खिंच के रहना

    आओ जो मिरे घर में तो इज़्ज़त है ये मेरी

    वो सामने सीढ़ी है जो मंज़ूर हो आना

    मक्खी ने सुनी बात जो मकड़े की तो बोली

    हज़रत किसी नादान को दीजेगा ये धोका

    इस जाल में मक्खी कभी आने की नहीं है

    जो आप की सीढ़ी पे चढ़ा फिर नहीं उतरा

    मकड़े ने कहा वाह फ़रेबी मुझे समझे

    तुम सा कोई नादान ज़माने में होगा

    मंज़ूर तुम्हारी मुझे ख़ातिर थी वगर्ना

    कुछ फ़ाएदा अपना तो मिरा इस में नहीं था

    उड़ती हुई आई हो ख़ुदा जाने कहाँ से

    ठहरो जो मिरे घर में तो है इस में बुरा क्या

    इस घर में कई तुम को दिखाने की हैं चीज़ें

    बाहर से नज़र आता है छोटी सी ये कुटिया

    लटके हुए दरवाज़ों पे बारीक हैं पर्दे

    दीवारों को आईनों से है मैं ने सजाया

    मेहमानों के आराम को हाज़िर हैं बिछौने

    हर शख़्स को सामाँ ये मयस्सर नहीं होता

    मक्खी ने कहा ख़ैर ये सब ठीक है लेकिन

    मैं आप के घर आऊँ ये उम्मीद रखना

    इन नर्म बिछौनों से ख़ुदा मुझ को बचाए

    सो जाए कोई इन पे तो फिर उठ नहीं सकता

    मकड़े ने कहा दिल में सुनी बात जो उस की

    फाँसूँ इसे किस तरह ये कम-बख़्त है दाना

    सौ काम ख़ुशामद से निकलते हैं जहाँ में

    देखो जिसे दुनिया में ख़ुशामद का है बंदा

    ये सोच के मक्खी से कहा उस ने बड़ी बी

    अल्लाह ने बख़्शा है बड़ा आप को रुत्बा

    होती है उसे आप की सूरत से मोहब्बत

    हो जिस ने कभी एक नज़र आप को देखा

    आँखें हैं कि हीरे की चमकती हुई कनियाँ

    सर आप का अल्लाह ने कलग़ी से सजाया

    ये हुस्न ये पोशाक ये ख़ूबी ये सफ़ाई

    फिर उस पे क़यामत है ये उड़ते हुए गाना

    मक्खी ने सुनी जब ये ख़ुशामद तो पसीजी

    बोली कि नहीं आप से मुझ को कोई खटका

    इंकार की आदत को समझती हूँ बुरा मैं

    सच ये है कि दिल तोड़ना अच्छा नहीं होता

    ये बात कही और उड़ी अपनी जगह से

    पास आई तो मकड़े ने उछल कर उसे पकड़ा

    भूका था कई रोज़ से अब हाथ जो आई

    आराम से घर बैठ के मक्खी को उड़ाया

    स्रोत:

    کلیات اقبال (Pg. 29)

    • लेखक: علامہ اقبال
      • प्रकाशक: ایجوکیشنل پبلشنگ ہاؤس،دہلی
      • प्रकाशन वर्ष: 2014

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