aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "मोहर्रम"
तिलोकचंद महरूम
1887 - 1966
शायर
मुकर्रम हुसैन आवान ज़मज़म
born.1979
महरम लखनवी
मोहर्रम अली शहरत नाैगानवी
लेखक
मो. मोहर अली
रफ़ी यूसुफ़ी महरम
मोहर्रम अली चिशती
1864 - 1934
मोहकम अब्बास
born.1994
शाह मोहम्म शर्फ़
पर्काशक
अहमद मुकर्रम अब्बासी
मोहतरमा ख़ातून अकरम
मोहतरमा हफ़ीज़ इनायतुल्लाह
अहमद मुकर्रम आज़मी
अबुल मुकर्रम हैरत
संपादक
इब्न-ए-मनज़ूर
इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूमऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ
वो हश्र तक हुसैन के मातम में रोएँगेहोगा अयाँ फ़लक पे मोहर्रम का जब हिलाल
दिल ने सीखा शेवा-ए-बेगानगीऐसे ना-महरम को महरम क्या करें
लुटी हर-गाम पर उम्मीद अपनीमोहर्रम बन गई हर ईद अपनी
उस ने सिलवा भी लिए होंगे सियह-रंग लिबासअब मोहर्रम की तरह ईद मनाती होगी
रेख़्ता मुहर्रम में निहित प्रतिरोध और बलिदान की भावना को श्रद्धांजलि अर्पित करता है
Armughan-e-Chishti
संकलन
Pak Dastarkhwan
महिलाओं की रचनाएँ
Bachon Ki Duniya
नज़्म
चिश्तिय्या
History Of The Muslims Of Bengal
भारत का इतिहास
Bahar-e-Tifli
Ganj-e-Maani
काव्य संग्रह
मोहर-ए-सुकूत
कहानी
तिलोक चंद मेहरूम
ज़ीनतउल्लाह जावेद
शायरी तन्क़ीद
तरक़ीमे, मोहरें अरज़ दीदे
ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी, पटना
शोध
Hikmat-e-Baligha
इस्लामियात
Rubaiyat
Ganj-e-Ma'ani
मरयम सीधी-सादी मेवा तन थीं। मेरी ख़ाला से मरते दम तक सिर्फ़ इसलिए ख़फ़ा रहीं कि अक़ीक़े पर उनका नाम फ़ातिमा रख दिया गया था। “री दुलहीन! बीबी फातमा तो एकई थीं। नबी जी सरकार की सहजादी थीं, दुनिया आखिरत की बाच्छा थीं। हम दोजख़ के कुन्दे भला उनकी बरोबरी...
अहल-ए-फ़न देंगे अँधेरों को उजालों का लक़बज़हर को क़ंद, मोहर्रम को कहा जाएगा ईद
मेरे महबूब मिरे प्यार को इल्ज़ाम न देहिज्र में ईद मनाई है मोहर्रम की तरह
बस्त-ओ-यकुम-ए-माह-ए-मोहर्रम है आजजिस आँख को देखिए वो पुर-नम है आज
किसी का कोई मर जाए हमारे घर में मातम हैग़रज़ बारह महीने तीस दिन हम को मोहर्रम है
बशीर भाई और अख़्तर दोनों फ़िक्र-मंद हो गए। "हमारे ख़ानदान के सब लोग तो याँ पे चले आए थे, बस मेरी वालिदा वहाँ रह गई थीं, उन्होंने कहा था कि मरते दम तक इमामबाड़ा नहीं छोड़ूँगी, हर साल अकेली मोहर्रम का इंतज़ाम करती थीं और बड़ा अलम उसी शान से...
लेकिन इस सिलसिले में हिन्दू अदीबों का अहम काम वो मर्सिए और सलाम हैं जो उन्होंने शहीदान-ए-कर्बला की नौहा-गरी में लिखे हैं। दक्कनी शायर राम राव जिसका ज़िक्र पहले आ चुका है, वो अव्वलीं हिन्दू शायर है जिसने शहादत-ए-इमाम हुसैन पर एक किताब क़लम-बंद की थी जो आज ना-पैद है।...
(4) मुहर्रम सर पर आ गया। सुल्ताना की दूसरी सहेलियों ने काले कपड़े बनवा लिए मगर वो ना बनवा सकी। इसलिए कि उसके पास कुछ नहीं था। (5) इस मौके पर शंकर आता है। एक आवारागर्द। ज़हानत, हाज़िर जवाबी और ख़ुश गुफ़्तारी के अलावा उसके पास भी कुछ नहीं। वो...
मौज-ए-हंगाम-ए-चराग़ाँ है न वो रंग-ए-अबीरशोख़ी-ए-ईद भी ख़ामोश मोहर्रम चुप-चाप
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