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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
तो मैं क्या कह रहा था यानी क्या कुछ सह रहा था मैं
अमाँ हाँ मेज़ पर या मेज़ पर से बह रहा था मैं
जौन एलिया
शेर
ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ मआज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
एक ख़्वाब
तू मिरे पास मिरे घर पे मिरे साथ है 'सोनूँ'
मेज़ पर फूल सजाते हुए देखा है कई बार
गुलज़ार
ग़ज़ल
मिरी उल्फ़त तअ'ज्जुब हो गई तौबा मआ'ज़-अल्लाह
कि मुँह से भी न निकले बात और अफ़्साना हो जाए
हफ़ीज़ जालंधरी
ग़ज़ल
मेज़ पर नन्हा सा इक काग़ज़ का टुकड़ा छोड़ कर
ज़िंदगी की हर ख़ुशी वो ना-गहानी ले गया
जहाँगीर नायाब
ग़ज़ल
मआ'ज़-अल्लाह उस की वारदात-ए-ग़म मआ'ज़-अल्लाह
चमन जिस का वतन हो और चमन-बे-ज़ार हो जाए




