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नज़्म
बुलावा
हमेशा बे-यक़ीनी के ख़तर से काँपते आए
हमेशा ख़ौफ़ के पैराहनों से अपने पैकर ढाँपते आए
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
इश्क़
आँख से चंद आँसू टपक कर मेरे
कान को ढाँपते मेरे बालों की सूखी लटों को भिगोतें हुए कान में जा गिरे
कँवल मलिक
ग़ज़ल
चढ़े जो धूप तमाज़त से जिस्म हाँपते हैं
जो दिन बुझे तो सितारों से रात ढाँपते हैं
शहनाज़ परवीन सहर
समस्त




