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ग़ज़ल
तरब-अंगेज़ हैं रंगीनियाँ फ़स्ल-ए-बहारी की
मगर बुलबुल उन्हें ख़ून-ए-रग-ए-बिस्मिल समझते हैं
असर सहबाई
शेर
हज़ारों बार सींचा है इसे ख़ून-ए-रग-ए-जाँ से
तअ'ज्जुब है मिरे गुलशन की वीरानी नहीं जाती
मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
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नज़्म
आज़ाद की रग सख़्त है मानिंद-ए-रग-ए-संग
آزاد کي رگ سخت ہے مانند رگ سنگ
محکوم کي رگ نرم ہے مانند رگ تاک
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
तू अगर ग़ैर है नज़दीक-ए-रग-ए-जाँ क्यूँ है
ना-शनासा है तो फिर महरम-ए-पिन्हाँ क्यूँ है
ज़हीर काश्मीरी
ग़ज़ल
फिर कोई ख़लिश नज़्द-ए-राग-ए-जाँ तो नहीं है
फिर दिल में वही नश्तर-ए-मिज़्गाँ तो नहीं है
राम कृष्ण मुज़्तर
ग़ज़ल
उन की नज़रों का वो पैवस्त-ए-रग-ए-जाँ होना
दिल जिगर दोनों का शर्मिंदा-ए-एहसाँ होना


