Ibn e Insha's Photo'

इब्न-ए-इंशा

1927 - 1978 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तानी शायर , अपनी ग़ज़ल ' कल चौदहवीं की रात ' थी , के लिए प्रसिद्ध

पाकिस्तानी शायर , अपनी ग़ज़ल ' कल चौदहवीं की रात ' थी , के लिए प्रसिद्ध

ग़ज़ल 30

नज़्म 28

शेर 30

कब लौटा है बहता पानी बिछड़ा साजन रूठा दोस्त

हम ने उस को अपना जाना जब तक हाथ में दामाँ था

  • शेयर कीजिए

रात कर गुज़र भी जाती है

इक हमारी सहर नहीं होती

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

कुछ ने कहा ये चाँद है कुछ ने कहा चेहरा तिरा

T'was a full moon out last night, all evening there was talk of you

Some people said it was the moon,and some said that it was you

T'was a full moon out last night, all evening there was talk of you

Some people said it was the moon,and some said that it was you

तंज़-ओ-मज़ाह 2

 

लेख 1

 

ई-पुस्तक 22

Aap Se Kya Parda

 

 

अावारागर्द की डायरी

 

2008

Awarah gaerd Ki Diary

 

1974

Billu Ka Basta

 

1996

Chalte Ho To Cheen Ko Chaliye

 

1979

Chalte Ho To Cheen Ko Chaliye

 

1981

Chand Nagar

 

2009

Dil-e-Wehshi

 

 

दुनिया गोल है

 

 

Ibn-e-Batuta Ke Taaqub Mein

 

 

चित्र शायरी 4

फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूटी हों अफ़्साने हों फ़र्ज़ करो ये जी की बिपता जी से जोड़ सुनाई हो फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी आधी हम ने छुपाई हो फ़र्ज़ करो तुम्हें ख़ुश करने के ढूँढे हम ने बहाने हों फ़र्ज़ करो ये नैन तुम्हारे सच-मुच के मय-ख़ाने हों फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूटा झूटी पीत हमारी हो फ़र्ज़ करो इस पीत के रोग में साँस भी हम पर भारी हो फ़र्ज़ करो ये जोग बजोग का हम ने ढोंग रचाया हो फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो देख मिरी जाँ कह गए बाहू कौन दिलों की जाने 'हू' बस्ती बस्ती सहरा सहरा लाखों करें दिवाने 'हू' जोगी भी जो नगर नगर में मारे मारे फिरते हैं कासा लिए भबूत रमाए सब के द्वारे फिरते हैं शाइ'र भी जो मीठी बानी बोल के मन को हरते हैं बंजारे जो ऊँचे दामों जी के सौदे करते हैं इन में सच्चे मोती भी हैं, इन में कंकर पत्थर भी इन में उथले पानी भी हैं, इन में गहरे सागर भी गोरी देख के आगे बढ़ना सब का झूटा सच्चा 'हू' डूबने वाली डूब गई वो घड़ा था जिस का कच्चा 'हू'

 

वीडियो 31

This video is playing from YouTube

वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
इस बस्ती के इक कूचे में

इस बस्ती के इक कूचे में इक 'इंशा' नाम का दीवाना इब्न-ए-इंशा

कुछ दे इसे रुख़्सत कर

कुछ दे इसे रुख़्सत कर क्यूँ आँख झुका ली है इब्न-ए-इंशा

फ़र्ज़ करो

फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों इब्न-ए-इंशा

ऑडियो 19

अर्श के तारे तोड़ के लाएँ काविश लोग हज़ार करें

'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

"कराची" के और शायर

  • सलीम अहमद सलीम अहमद
  • रसा चुग़ताई रसा चुग़ताई
  • रईस फ़रोग़ रईस फ़रोग़
  • दिलावर फ़िगार दिलावर फ़िगार
  • मुस्तफ़ा ज़ैदी मुस्तफ़ा ज़ैदी
  • जमीलुद्दीन आली जमीलुद्दीन आली
  • जौन एलिया जौन एलिया
  • अज़ीज़ हामिद मदनी अज़ीज़ हामिद मदनी
  • अतहर नफ़ीस अतहर नफ़ीस
  • ज़ेहरा निगाह ज़ेहरा निगाह

Added to your favorites

Removed from your favorites