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नज़्म
ताज-महल
लेकिन उन के लिए तश्हीर का सामान नहीं
क्यूँकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़्लिस थे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आवारा
जैसे मुफ़्लिस की जवानी जैसे बेवा का शबाब
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
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ग़ज़ल
हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्तानें हैं
कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
वसी शाह
नज़्म
आदमी-नामा
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमी
और मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमी
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हच-हाईकर
मेहरबाँ हैं तिरी आँखें मगर ऐ मूनिस-ए-जाँ
इन से हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो नहीं भर सकता
अहमद फ़राज़
नज़्म
इक शहंशाह ने बनवा के....
जिस के परवानों में मुफ़्लिस भी हैं ज़रदार भी हैं
संग-ए-मरमर में समाए हुए ख़्वाबों की क़सम
शकील बदायूनी
नज़्म
मुफ़्लिसी
तअ'ज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँ
मुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँ