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नज़्म
कभी कभी
गुज़र रहा हूँ कुछ अन-जानी रहगुज़ारों से
मुहीब साए मिरी सम्त बढ़ते आते हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
परछाइयाँ
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक़ घुटने लगी भरती के दफ़ातिर बढ़ने लगे
साहिर लुधियानवी
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शेर
कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (2)
खेल इक सादा मोहब्बत का
शब ओ रोज़ के इस बढ़ते हुए खोखले-पन में जो कभी खेलते हैं
नून मीम राशिद
नज़्म
हिण्डोला
इसी फ़ज़ा में बढ़ाई थी पेंग बचपन की
इन्ही नज़ारों में सावन के गीत गाए थे
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मेरे भी हैं कुछ ख़्वाब
कुछ ख़्वाब हैं आज़ाद मगर बढ़ते हुए नूर से मरऊब
ने हौसला-ए-ख़ूब है ने हिम्मत-ए-ना-ख़ूब

