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नज़्म
रूह-ए-अर्ज़ी आदम का इस्तिक़बाल करती है
बेताब न हो मार्का-ए-बीम-ओ-रजा देख!
हैं तेरे तसर्रुफ़ में ये बादल ये घटाएँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
किसान
ख़ार-ओ-ख़स पर एक दर्द-अंगेज़ अफ़्साने की शान
बाम-ए-गर्दूं पर किसी के रूठ कर जाने की शान
जोश मलीहाबादी
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ग़ज़ल
वो मर्ग़-ज़ार कि बीम-ए-ख़िज़ाँ नहीं जिस में
ग़मीं न हो कि तिरे आशियाँ से दूर नहीं
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
उमीद-ओ-बीम के मेहवर से हट के देखते हैं
ज़रा सी देर को दुनिया से कट के देखते हैं
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
तग़ाफ़ुल बद-गुमानी बल्कि मेरी सख़्त-जानी से
निगाह-ए-बे-हिजाब-ए-नाज़ को बीम-ए-गज़ंद आया
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
लूँ वाम बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता से यक ख़्वाब-ए-ख़ुश असद
लेकिन ये बीम है कि कहाँ से अदा करूँ











