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ग़ज़ल
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
मुज़्तर ख़ैराबादी
ग़ज़ल
ठहरो तेवरी को चढ़ाए हुए जाते हो किधर
दिल का सदक़ा तो अभी सर से उतर जाने दो
मियाँ दाद ख़ां सय्याह
नज़्म
हिण्डोला
किसी का झाँकना आहिस्ता फूटती पौ से
वो दोपहर का समय दर्जा-ए-तपिश का चढ़ाव
फ़िराक़ गोरखपुरी
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रेख़्ता शब्दकोश
cha.Dhaa.ii
चढ़ाईچَڑھائی
ऐसी भूमि जिसका विस्तार एक ओर से बराबर ऊँचा होता गया हो, ऊँचाई की ओर जाने वाली भूमि, उत्थान
gha.Dnaa.e
घड़नाएگَھڑنائے
گھڑوں یا مٹکوں پر بنائی ہوئی ایک قسم کی کشتی ، گھرنائی.
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नज़्म
रिश्वत
कोढ़ियों पर आस्तीं कब से चढ़ाए हैं हुज़ूर
कोढ़ को लेकिन कलेजे से लगाए हैं हुज़ूर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
भारत के सपूतों से ख़िताब
जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना
उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ
लाल चन्द फ़लक
ग़ज़ल
हम हैं ऐ यार चढ़ाए हुए पैमाना-ए-इश्क़
तिरे मतवाले हैं मशहूर हैं मस्ताना-ए-इश्क़
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
चढ़ाए आस्तीं ख़ंजर-ब-कफ़ वो यूँ जो फिरता है
उसे क्या जाने है उस अरबदा-जूई से क्या हासिल


