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ग़ज़ल
निगह-ए-शोख़ में और दिल में हैं चोटें क्या क्या
आज तक हम न समझ पाए कि झगड़ा क्या है
फ़िराक़ गोरखपुरी
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नज़्म
जुदाई
उभर गई हैं वो चोटें दबी-दबाई हुई
सुपुर्दगी ओ ख़ुलूस-ए-निहाँ के पर्दे में
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
निगह को बेबाकियाँ सिखाओ हिजाब-ए-शर्म-ओ-हया उठाओ
भुला के मारा तो ख़ाक मारा लगाओ चोटें जता-जता कर
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल
अब ऐसी करम की बातों से दबती हैं कहीं दिल की चोटें
तुम जितना मिटाते जाते हो ये नक़्श उभरते आते हैं
जमीलुद्दीन आली
नज़्म
देहली
मगर कुछ अब की दफ़ा इस तरह के चरके हैं
कि जितनी चोटें हैं उतने ही दिल के टुकड़े हैं





