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ग़ज़ल
नक़ाब-ए-रुख़ उलट कर आ रहे थे वो सर-ए-महफ़िल
हुईं जब मुझ से चार आँखें तो झट शर्मा के मुँह ढाँका
सय्यद अहमद चिश्ती देहलवी
ग़ज़ल
ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है
जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
वो नवा-ए-मुज़्महिल क्या न हो जिस में दिल की धड़कन
वो सदा-ए-अहल-ए-दिल क्या जो अवाम तक न पहुँचे



