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ग़ज़ल
ये इश्क़ होता है बिन सिखाए कि उस का कोई निसाब कैसा
हर इक है इस राह का मुसाफ़िर फ़क़ीर कैसा नवाब कैसा
अक़्सा फ़ैज़
नज़्म
आज की दुनिया
फिर छेड़ती है मौत हयात-ए-फ़सुर्दा को
फिर आतिश-ए-ख़मोश को उकसा रही है आज
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
अक़्सा फ़ैज़
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ग़ज़ल
हैं जितने भी रूप ज़िंदगी के किसी पे न ए'तिबार आया
वहाँ से दामन बचा के गुज़रे जहाँ पे कोई फ़रार आया
अक़्सा फ़ैज़
नअत
सारे नबियों के हैं झुरमुट में नबी-ए-आख़िर
क़ाबिल-ए-दीद है अक़सा की ज़मीं आज की रात
माहिर-उल क़ादरी
नज़्म
शाइर-ए-मशरिक़ की अर्ज़-दाश्त
मग़रिब की शाम अपनी सहर से हसीं है क्यूँ
इस कश्मकश में दौलत-ए-उक़्बा भी छिन गई
ज़हीर सिद्दीक़ी
नज़्म
शिकस्त-ए-रंग
मुझे मग़्लूब करने को
मिरे जज़्बात के अंदोख़्ता हीलों को उकसा कर वो कहते हैं










