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ग़ज़ल
'फ़राज़' इश्क़ की दुनिया तो ख़ूब-सूरत थी
ये किस ने फ़ित्ना-ए-हिज्र-ओ-विसाल रक्खा है
अहमद फ़राज़
शेर
मुज़्तर ख़ैराबादी
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ग़ज़ल
ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है
हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
दोस्ती का हाथ
सितम तो ये है कि दोनों के मर्ग़-ज़ारों से
हवा-ए-फ़ित्ना ओ बू-ए-फ़साद आती है
अहमद फ़राज़
ग़ज़ल
बहादुर शाह ज़फ़र
नज़्म
ख़िज़्र-ए-राह
आने वाले दौर की धुँदली सी इक तस्वीर देख
आज़मूदा फ़ित्ना है इक और भी गर्दूं के पास
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नौ-जवान ख़ातून से
हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था
ख़ुद अपने हुस्न को पर्दा बना लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
असर ये भी है इक मेरे जुनून-ए-फ़ित्ना-सामाँ का
मिरा आईना-ए-दिल है क़ज़ा के राज़-दानों में











