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नज़्म
मैं पल दो पल का शा'इर हूँ
मुझ से पहले कितने शा'इर आए और आ कर चले गए
कुछ आहें भर कर लौट गए कुछ नग़्मे गा कर चले गए
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
तुम ही न सुन सके अगर क़िस्सा-ए-ग़म सुनेगा कौन
किस की ज़बाँ खुलेगी फिर हम न अगर सुना सके
हफ़ीज़ जालंधरी
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नज़्म
मजबूरियाँ
मैं आहें भर नहीं सकता कि नग़्मे गा नहीं सकता
सकूँ लेकिन मिरे दिल को मयस्सर आ नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
किस से मोहब्बत है
मिरे शाने पे सर तक रख दिया है गीत गाए हैं
मिरी दुनिया बदल देती हैं ख़ुश-अल्हानियाँ उस की
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
नज़्र-ए-दिल
तुम अगर रूठो तो इक तुम को मनाने के लिए
गीत गा सकता हूँ मैं आँसू बहा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
हसन कूज़ा-गर (2)
कि तिरे घर के दरीचों के कई शीशों पर
उस से पहले की भी दुर्ज़ें थीं बहुत
नून मीम राशिद
नज़्म
ईद का दिन
नवेद-ए-कामरानी ला रहे हैं रेस के घोड़े
मसर्रत के तराने गा रहे हैं रेस के घोड़े
मजीद लाहौरी
नज़्म
जुगनू
बिफर गए थे हमारे वतन के पीर ओ जवाँ
दयार-ए-हिन्द में रन पड़ गया था चार तरफ़







