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ग़ज़ल
है मेरे सामने तस्वीर-ए-चश्म-ए-यार हनूज़
मैं पी रहा हूँ मय-ए-हुस्न बार बार हनूज़
एस. नूरुद्दीन अनवर भोपाली
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ग़ज़ल
गर्दिश-ए-चश्म-ए-मस्त से दिल को लुभा गया कोई
अक़्ल पे मुझ को नाज़ था वो भी मिटा गया कोई
जौहर निज़ामी
ग़ज़ल
चाहिए परहेज़-ए-गर्दिश चश्म-ए-शोख़-ए-यार को
घूमने से जब ज़ियाँ है मर्दुम-ए-बीमार को
मोहम्मद इब्राहीम आजिज़
शेर
है इन दिनों में गर्दिश-ए-चश्म-ए-बुताँ का दौर
तेरा ज़माना गर्दिश-ए-दौराँ निकल गया
क़ुर्बान अली सालिक बेग
ग़ज़ल
दिल को चश्म-ए-यार ने जब जाम-ए-मय अपना दिया
उन से ख़ुश हो कर लिया और कह के बिस्मिल्लाह पिया
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
न जाने सेहर ये क्या तू ने चश्म-ए-यार किया
कि मैं ने होश के जामे को तार-तार किया

