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ग़ज़ल
है ज़िक्र-ए-यार क्यूँ शब-ए-ज़िंदाँ से दूर दूर
ऐ हम-नशीं ये तर्ज़ ग़ज़ल का कभी न था
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
ख़ुशबू-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार थी एहसास-ओ-फ़िक्र में
ज़ेहनों में अहल-ए-फ़न के महकती रही ग़ज़ल