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ग़ज़ल
शराब लाल-ए-लब-ए-दिल-बराँ है मुझ कूँ मुबाह
अब ऐश-ओ-इशरत-ए-दोनों-जहाँ है मुझ कूँ मुबाह
अब्दुल वहाब यकरू
ग़ज़ल
वो भोले-पन से दे दे बोसा-ए-ला'ल-ए-लब-ए-शीरीं
कोई तरकीब ऐसी ऐ दिल-ए-नादान पैदा कर
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
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ग़ज़ल
रश्क-ए-ला'ल-ए-लब-ए-लालीं से जिगर-ख़ूँ याक़ूत
शर्म-ए-दंदाँ से है मोती की हर इक लड़ पानी
शाद लखनवी
ग़ज़ल
कहिए वो ला'ल-ए-लब ख़त-ए-मुश्कीं में देख कर
पैदा हुआ है लाल-ए-बदख़्शाँ ततार में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
नज़्म
ख़्वाब जो बिखर गए
वो ल'अल ओ लब के तज़्किरे, वो ज़ुल्फ़ ओ रुख़ के ज़मज़मे
वो कारोबार-ए-आरज़ू वो वलवले, वो हमहमे
आमिर उस्मानी
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
नुत्क़ हो जाता है इल्मी इस्तलाहों से उदास
लाल-ए-लब में शहद की बाक़ी नहीं रहती मिठास
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
नौ-मुलाज़िम लाल-ए-लब को ले गए तनख़्वाह में
बे-तलब रहता है ये नौकर तिरी सरकार का
अशरफ़ अली फ़ुग़ाँ
कुल्लियात
सर जोड़ जोड़ जैसे मिल बैठते हैं अहबाब
क्या लाल-ए-लब किसू के ऐ 'मीर' चित चढ़े हैं

