लब पर शेर
महबूब के लबों की तारीफ़-ओ-तहसीन
और उनसे शिकवे-शिकायत शायरी में आम है। लबों की ख़ूबसूरती और उनकी ना-ज़ुकी के मज़मून को शायेरों ने नए नए दढिंग से बाँधा है । लबों के शेरी बयान में एक पहलू ये भी रहा है कि उन पर एक गहरी चुप पड़ी हुई है, वो हिलते नहीं आशिक़ से बात नहीं करते। ये लब कहीं गुलाब की पंखुड़ी की तरह नाज़ुक हैं तो कहीं उनसे फूल झड़ते हैं। इस मज़मून में और भी कई दिल-चस्प पहलू हैं। हमारा ये इन्तिख़ाब पढ़िए।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है
Interpretation:
Rekhta AI
कवि प्रिय के होंठों की कोमल सुंदरता पर मुग्ध है और मानता है कि उसे शब्दों में कहना पूरा नहीं हो पाता। गुलाब की पंखुड़ी की उपमा नर्मी, ताज़गी और नाज़ुकपन का भाव जगाती है। प्रश्नवाचक ढंग प्रशंसा को बढ़ाता है और उस सौंदर्य को अनोखा बताता है।
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कितने शीरीं हैं तेरे लब कि रक़ीब
गालियाँ खा के बे-मज़ा न हुआ
Interpretation:
Rekhta AI
शायर कहता है कि महबूब के होंठों में इतनी मिठास है कि कड़वी बातें भी मीठी लगती हैं। रक़ीब को जब महबूब ने गालियाँ दीं, तो उसे बुरा लगने के बजाय मज़ा आया क्योंकि वह गालियाँ उन ख़ूबसूरत और मीठे होंठों से निकली थीं। यहाँ अपमान में भी प्रेम का आनंद दिखाया गया है।
सो देख कर तिरे रुख़्सार ओ लब यक़ीं आया
कि फूल खिलते हैं गुलज़ार के अलावा भी
क्यूँ परखते हो सवालों से जवाबों को 'अदीम'
होंट अच्छे हों तो समझो कि सवाल अच्छा है
तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक-बदन कहाँ
ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ
सिर्फ़ उस के होंट काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं
ख़ुद बना लेती है होंटों पर हँसी अपनी जगह
एक दम उस के होंट चूम लिए
ये मुझे बैठे बैठे क्या सूझी
उन लबों ने न की मसीहाई
हम ने सौ सौ तरह से मर देखा
ख़ुदा को मान कि तुझ लब के चूमने के सिवा
कोई इलाज नहीं आज की उदासी का
तिरे लबों को मिली है शगुफ़्तगी गुल की
हमारी आँख के हिस्से में झरने आए हैं
आता है जी में साक़ी-ए-मह-वश पे बार बार
लब चूम लूँ तिरा लब-ए-पैमाना छोड़ कर
बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई
मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा
होंटों पर इक बार सजा कर अपने होंट
उस के बाद न बातें करना सो जाना
किसी को ख़्वाब में अक्सर पुकारते हैं हम
'अता' इसी लिए सोते में होंट हिलते हैं
काँपते होंट भीगती पलकें
बात अधूरी ही छोड़ देता हूँ
क्या करूँ ऐ तिश्नगी तेरा मुदावा बस वो लब
जिन लबों को छू के पानी आग बनता जाए है
अश्क आँखों से मिरी निकले मुसलसल लेकिन
उस ने इक हर्फ़-ए-तसल्ली न निकाला लब से
ग़ुरूर-ए-तिश्ना-दहानी तिरी बक़ा की क़सम
नदी हमारे लबों की तरफ़ उछलती रही
ये लब-ओ-रुख़्सार ये चेहरा तेरा पुर-नूर सा
तुझ को क्या देखा लगा जैसे कोई देखी ग़ज़ल
मुद्दत के बा'द 'नूर' हँसी लब पे आई है
वो अपना हम-ख़याल बना ले गया मुझे
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टैग : मुस्कुराहट
ज़ुल्म सह के भी मैं ने होंट सी लिए 'ग़ाज़ी'
एक ज़र्फ़ उन का है एक ज़र्फ़ मेरा है
कली चटख़ के लबों के मिज़ाज तक पहुँची
गुलाब टूट के सुर्ख़ी-ए-गाल तक आए
मिरे अशआ'र हैं वो आसमानी ख़्वाब जिन को
मिरी मिट्टी के होंठों पर उतारा जा रहा है
साक़िया मुहर-ब-लब कर के सिला क्या पाया
हश्र कुछ और ख़मोशी ने बपा रक्खा है
कोई मोजज़ाती सा एक दिल-रुबा लम्हा
उस के होंट खुल जाएँ मेरे लब पे ताला हो
इक बोसा सब्त करने का ए'लान कर दिया
होंटों का जिस ने रख दिया हुलिया बिगाड़ कर