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रद करें डाउनलोड शेर

तिश्नगी पर शेर

यूँ तो प्यास पानी की

तलब का नाम है लेकिन उर्दू शायरी या अदब में किसी भी शय की शदीद ख़्वाहिश को प्यास का ही नाम दिया गया है। प्यास के हवाले से कर्बला के वाक़ेआत की तरफ़ भी उर्दू शायरी में कई हवाले मिलते हैं। साक़ी शराब और मैख़ाने का भी शायरी ने तश्नगी से रिश्ता जोड़ रखा है। तश्नगी शायरी के ये बे-शुमार रंग मुलाहिज़ा फ़रमाइयेः

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

दिवाकर राही

बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ

राहत इंदौरी

तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह थी

कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया

यासिर ख़ान इनाम

पीता हूँ जितनी उतनी ही बढ़ती है तिश्नगी

साक़ी ने जैसे प्यास मिला दी शराब में

अज्ञात

साक़िया तिश्नगी की ताब नहीं

ज़हर दे दे अगर शराब नहीं

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ प्यास का मतलब सिर्फ पानी की प्यास नहीं, बल्कि तीव्र चाह और मन की जलन है। शराब राहत, प्रेम या मदहोशी का संकेत है जो इस बेचैनी को शांत कर सकती है। जब वह नहीं मिलती, तो बोलने वाला कहता है कि ऐसे तड़पते रहने से अच्छा है ज़हर मिल जाए। यह शेर मजबूरी और हद से बढ़ी हुई बेकरारी को दिखाता है।

दाग़ देहलवी

वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था

पानी पानी कहते कहते डूब गया है

आनिस मुईन

कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो

शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है

क़ैसर-उल जाफ़री

प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर

भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देख कर

साक़ी फ़ारुक़ी

तिश्ना-लब ऐसा कि होंटों पे पड़े हैं छाले

मुतमइन ऐसा हूँ दरिया को भी हैरानी है

क़मर अब्बास क़मर

वो सामने हैं मगर तिश्नगी नहीं जाती

ये क्या सितम है कि दरिया सराब जैसा है

अज्ञात

ऐसी प्यास और ऐसा सब्र

दरिया पानी पानी है

विकास शर्मा राज़

वो मजबूरी मौत है जिस में कासे को बुनियाद मिले

प्यास की शिद्दत जब बढ़ती है डर लगता है पानी से

मोहसिन असरार

रूह किस मस्त की प्यासी गई मय-ख़ाने से

मय उड़ी जाती है साक़ी तिरे पैमाने से

Interpretation: Rekhta AI

कवि हैरानी से पूछता है कि मयख़ाने से भी कोई आत्मा तृप्त हुए बिना कैसे जा सकती है—यह प्यास मन की गहरी चाह है। दूसरे मिसरे में साक़ी और प्याले की आकर्षकता का अतिशयोक्ति से वर्णन है: शराब ठहरती नहीं, तुरंत खत्म हो जाती है। ‘शराब’ और ‘मयख़ाना’ आनंद/मस्ती के प्रतीक हैं, और ‘प्यास’ अंतहीन चाह का संकेत।

दाग़ देहलवी

कमाल-ए-तिश्नगी ही से बुझा लेते हैं प्यास अपनी

इसी तपते हुए सहरा को हम दरिया समझते हैं

जिगर मुरादाबादी

आज पी कर भी वही तिश्ना-लबी है साक़ी

लुत्फ़ में तेरे कहीं कोई कमी है साक़ी

आल-ए-अहमद सुरूर

साक़ी मिरे भी दिल की तरफ़ टुक निगाह कर

लब-तिश्ना तेरी बज़्म में ये जाम रह गया

ख़्वाजा मीर दर्द

साहिल तमाम अश्क-ए-नदामत से अट गया

दरिया से कोई शख़्स तो प्यासा पलट गया

शकेब जलाली

जिसे भी प्यास बुझानी हो मेरे पास रहे

कभी भी अपने लबों से छलकने लगता हूँ

फ़रहत एहसास

साक़ी मुझे ख़ुमार सताए है ला शराब

मरता हूँ तिश्नगी से ज़ालिम पिला शराब

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

हर्फ़ अपने ही मआनी की तरह होता है

प्यास का ज़ाइक़ा पानी की तरह होता है

फ़ैसल अजमी

फिर इस के बाद हमें तिश्नगी रहे रहे

कुछ और देर मुरव्वत से काम ले साक़ी

कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर

दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं

दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाते हैं

फ़ारिग़ बुख़ारी

था ज़हर को होंटों से लगाना ही मुनासिब

वर्ना ये मिरी तिश्ना-लबी कम नहीं होती

अक़ील नोमानी

प्यास की सल्तनत नहीं मिटती

लाख दजले बना फ़ुरात बना

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

इक जनम के प्यासे भी सैर हों तो हम जानें

यूँ तो रहमत-ए-यज़्दाँ चार-सू बरसती है

हनीफ़ फ़ौक़

ये सोच के दानिस्ता रहा उस से बहुत दूर

मग़रूर है दरिया मुझे प्यासा समझ ले

इनाम शरर अय्यूबी

क्या करूँ तिश्नगी तेरा मुदावा बस वो लब

जिन लबों को छू के पानी आग बनता जाए है

शकील जाज़िब

खींच लाई जानिब-ए-दरिया हमें भी तिश्नगी

अब गुलू-ए-ख़ुश्क का ख़ंजर पे रम होने को है

अभिनंदन पांडे

इस एहतिमाम से अक्सर उठे हैं पैमाने

कि बूँद बूँद को मैं जानों या ख़ुदा जाने

शहाब सर्मदी

आप सागर हैं तो सैराब करें प्यासे को

आप बादल हैं तो मुझ दश्त पे साया कीजिए

अब्दुर्रहीम नश्तर

इक ऐसी बे-नतीजा जंग लड़ कर रहा हूँ मैं

कि अब शमशीर से बढ़ कर पियाला अच्छा लगता है

जमाल एहसानी

बराबर एक प्यासी रूह की आवाज़ आती है

कुओं से पन-घटों से नद्दियों से आबशारों से

कैफ़ भोपाली

अपने लहू से प्यास बुझानी है ता-हयात

अब रास्ते में कोई समुंदर आएगा

अनवर अंसारी

ज़रूर उस का कोई प्यास से मरा होगा

वो कितने प्यार से पानी पिला रहा था हमें

नदीम भाभा

यूँ भी कट सकते हैं ये तिश्ना-लबी के लम्हात

बैठ कर बज़्म में साक़ी को दुआ दें हम लोग

शायर जमाली

किसी भी प्यास के मारे की प्यास बुझ सकी

समुंदरों में तो आते रहे उछाल बहुत

बख़्श लाइलपूरी

शिद्दत-ए-प्यास के एहसास को बढ़ने दीजे

एड़ियों से कभी चश्मे भी उबल सकते हैं

मुख़तार तलहरी
बोलिए