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दिवाकर राही

रामपुर, भारत

प्रसिद्ध शायर, लोकप्रिय शे’र ‘अब तो इतनीभी मयस्सर नहीं मयखाने में - जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में’ के रचयिता

प्रसिद्ध शायर, लोकप्रिय शे’र ‘अब तो इतनीभी मयस्सर नहीं मयखाने में - जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में’ के रचयिता

ग़ज़ल 4

 

शेर 15

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

the tavern does not even give that much wine to me

that I was wont to waste in the goblet casually

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वक़्त बर्बाद करने वालों को

वक़्त बर्बाद कर के छोड़ेगा

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अगर मौजें डुबो देतीं तो कुछ तस्कीन हो जाती

किनारों ने डुबोया है मुझे इस बात का ग़म है

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इस से पहले कि लोग पहचानें

ख़ुद को पहचान लो तो बेहतर है

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इस इंतिज़ार में बैठे हैं उन की महफ़िल में

कि वो निगाह उठाएँ तो हम सलाम करें

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पुस्तकें 4

Charagh-e-Manzil

 

1981

Manzil ki Taraf

 

1969

Sad Chak

 

1985

 

चित्र शायरी 2

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में

 

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