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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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अज्ञात

अज्ञात

ग़ज़ल 21

नज़्म 10

अशआर 558

ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठ कर

या वो जगह बता दे जहाँ पर ख़ुदा हो

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ख़ुदा ही मिला विसाल-ए-सनम इधर के हुए उधर के हुए

रहे दिल में हमारे ये रंज-ओ-अलम इधर के हुए उधर के हुए

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अगर फ़िरदौस बर-रू-ए-ज़मीं अस्त

हमीं अस्त हमीं अस्त हमीं अस्त

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कभी तेरा दर कभी दर-ब-दर कभी 'अर्श पर कभी फ़र्श पर

ग़म-ए-'आशिक़ी तिरा शुक्रिया मैं कहाँ कहाँ से गुज़र गया

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सलीक़े से हवाओं में जो ख़ुशबू घोल सकते हैं

अभी कुछ लोग बाक़ी हैं जो उर्दू बोल सकते हैं

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हास्य 1

 

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अज्ञात

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अज्ञात

अज्ञात

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अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

"Anam" a Nazm By Faraz Ahmad sung By: Sunil Chaudhry

अज्ञात

Aa Kar Ke Meri Kabr Par - Bahadur Shah Zafar

अज्ञात

Aaj phir dil ne kaha aao bhuladen yaaden

अज्ञात

Ab ke uski aankhon mein

अज्ञात

Ab rahiye baith ek jangal mein

अज्ञात

Allama Iqbal Urdu & Farsi Nazam

अज्ञात

Amazing Urdu Naat by Ghulam Muhammad Qasir

अज्ञात

An Evening on Asrar ul Haq Majaz Birth Anniversary by Muzzafar Ali's Rumi Foundation(Lucknow Chapter)

अज्ञात

Apne hone ka hum ehsaas jagaane aae

अज्ञात

Apne markaz se agar door nikal jao ge

अज्ञात

Baat Kar

अज्ञात

Bedam Shah Warsi's 'Hamari Jaan Ho...' sung by Azalea Ray

अज्ञात

Chalo chodo mohabbat jhoot hai

अज्ञात

Dil Ko Jahan Bhar Ke Muhabbat Mein Gham Mile

अज्ञात

Diwali Nazm

अज्ञात

dushmanon ne to dushmani ki hai

अज्ञात

Ibtedaa-e-Zindagi

अज्ञात

Ilahi koi hawa ka

अज्ञात

In Solidarity with Gaza - Ahmed Faraz Nazm

अज्ञात

Is tapish ka hai mazaa dil hi ko haasil

अज्ञात

Jab un se mile

अज्ञात

Jo khayaal the na qayaas the

अज्ञात

Kaee saal guzre kaee saal beete

अज्ञात

Kamla Devi singing Fani Badayuni

अज्ञात

Main jahaan rahoon

अज्ञात

Maine dekha tha un dino mein use

अज्ञात

Mansab to hamein bhi mil sakte the

अज्ञात

Matlabi hain log yahan par, matlabi zamaana

अज्ञात

More Jobna Ka Ubhar Papi Jobna Ka Dekho Zohrabai Ambalewali

अज्ञात

Mughe apne zabt pe naz tha

अज्ञात

Mujhe ab laut jane de

अज्ञात

Mujhe maut di ke hayaat di

अज्ञात

Na samaaton mein tapish ghuleNa samaaton mein tapish ghule

अज्ञात

Phir usi dasht se aa mil le milaale

अज्ञात

Rang mausam ka haraa tha pehle

अज्ञात

Saaye-e-Ahmed-e-Mukhtar Mubarak Bashad - Kalam-e-Bedam Shah Warsi by Ahsan & Adil Hussain Khan

अज्ञात

shauq-e-beintiha na de jana

अज्ञात

Shikast e zarf ko pindaar e rindana nahin kehte

अज्ञात

Shikwa bhi jafa ka kaise karein

अज्ञात

Shouq Se Nakami Ki Badaulat

अज्ञात

Tere pyar ki tamanna

अज्ञात

Teri aankhen

अज्ञात

Tujhse milne ka nahin koi imkaan jaana

अज्ञात

Tum naghma e mah o anjum ho

अज्ञात

Tumhain Dekh K Yaad Aata Hai Mujhay..... Kahin Pehlay Bhe Tum Sy Mila Hu Mein

अज्ञात

Vocal Title: Kis Ne Zarron Ko Uthaya کس نے ذروں کو اٹھایا Lyrics: Pandit Harichand Akhtar

अज्ञात

Ye to uska hi karishma hai

अज्ञात

Yeh nigah e sharm jhuki jhuki

अज्ञात

अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं

अज्ञात

अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ

अज्ञात

अगर जो प्यार ख़ता है तो कोई बात नहीं

अज्ञात

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

अज्ञात

अगर है ज़िंदगी इक जश्न तो ना-मेहरबाँ क्यों है

अज्ञात

अगरचे मुझ को जुदाई तिरी गवारा नहीं

अज्ञात

अच्छे ईसा हो मरीज़ों का ख़याल अच्छा है

अज्ञात

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

अज्ञात

अचानक दिलरुबा मौसम का दिल-आज़ार हो जाना

अज्ञात

अजनबी शहर की अजनबी शाम में

अज्ञात

अजब हालत हमारी हो गई है

अज्ञात

अज़ल के मुसव्विर से

बना बना के तू करता है क्यों फ़ना हम को अज्ञात

अज़ल के मुसव्विर से

बना बना के तू करता है क्यों फ़ना हम को अज्ञात

अज़ल के मुसव्विर से

बना बना के तू करता है क्यों फ़ना हम को अज्ञात

अज़ाब-ए-दीद में आँखें लहू लहू कर के

अज्ञात

अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए

अज्ञात

अजीब ख़्वाब था उस के बदन में काई थी

अज्ञात

अदा-ए-इश्क़ हूँ पूरी अना के साथ हूँ मैं

अज्ञात

अपने एहसास से छू कर मुझे संदल कर दो

अज्ञात

अपने घर की खिड़की से मैं आसमान को देखूँगा

अज्ञात

अपने मरकज़ से कट गया हूँ मैं

अज्ञात

अपने सब यार काम कर रहे हैं

अज्ञात

अपने होंटों पर सजाना चाहता हूँ

अज्ञात

अपना ख़ाका लगता हूँ

अज्ञात

अपना सा शौक़ औरों में लाएँ कहाँ से हम

अज्ञात

अपनी गिरह से कुछ न मुझे आप दीजिए

अज्ञात

अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे

अज्ञात

अपनी धुन में रहता हूँ

अज्ञात

अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो

अज्ञात

अपनी मिट्टी को सर-अफ़राज़ नहीं कर सकते

अज्ञात

अपनी हालत का मुझे ध्यान नहीं होता है

अज्ञात

अब ऐसे चाक पर कूज़ा-गरी होती नहीं थी

अज्ञात

अब के बारिश में तो ये कार-ए-ज़ियाँ होना ही था

अज्ञात

अब किस से कहें और कौन सुने जो हाल तुम्हारे बाद हुआ

अज्ञात

अब ये सोचूँ तो भँवर ज़ेहन में पड़ जाते हैं

अज्ञात

अभी कुछ और करिश्मे ग़ज़ल के देखते हैं

अज्ञात

अयादत होती जाती है इबादत होती जाती है

अज्ञात

अल-अर्ज़-ए-लिल्लाह

अज्ञात

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अज्ञात

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

अज्ञात

आओ ना मुझ में उतर जाओ ग़ज़ल होने तक

अज्ञात

आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

अज्ञात

आख़िर ऐसा क्यों है पापा

आख़िर ऐसा क्यों है पापा अज्ञात

आँखों के साथ उसे मिरा हँसना नहीं पसंद

अज्ञात

आँखों का है क़ुसूर अगर वो अयाँ नहीं

अज्ञात

आँखों में ख़्वाब पावँ में छालों को पाल कर

अज्ञात

आँखों में रंग प्यार के भरने लगी हूँ मैं

अज्ञात

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अज्ञात

आँगन में छोड़ आए थे जो ग़ार देख लें

अज्ञात

आज लब-ए-गुहर-फ़िशाँ आप ने वा नहीं किया

अज्ञात

आज़ाद की रग सख़्त है मानिंद-ए-रग-ए-संग

अज्ञात

आदमी पहले तो लाज़िम है कि इंसान बने

अज्ञात

आप की ओर इक नज़र देखा

अज्ञात

आप की ओर इक नज़र देखा

अज्ञात

आप नाहक़ मलाल करते हैं

अज्ञात

आप से शिकवा-ए-बेदाद करूँ या न करूँ

अज्ञात

आप-बीती ज़रा सुना ऐ दश्त

अज्ञात

आरज़ूओं का सिलसिला क्या है

अज्ञात

आलम तिरी निगह से है सरशार देखना

अज्ञात

आशिक़ जो इस गली का भी मर कर चला गया

अज्ञात

आशिक़ थे शहर में जो पुराने शराब के

अज्ञात

आसमाँ साहिल समुंदर और मैं

अज्ञात

आसमानों से ज़मीं की तरफ़ आते हुए हम

अज्ञात

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

अज्ञात

इक कर्ब-ए-मुसलसल की सज़ा दें तो किसे दें

अज्ञात

इक ग़ज़ल तो मिरे हाथों से मिसाली हो जाए

अज्ञात

इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला

अज्ञात

इक ज़रा सी दिल की हसरत तुम से उल्फ़त और तुम

अज्ञात

इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को

अज्ञात

इक साँप मुझ को चूम के तिरयाक़ दे गया

अज्ञात

इक हुनर था कमाल था क्या था

अज्ञात

इक हुनर है जो कर गया हूँ मैं

अज्ञात

इतने आँसू तो न थे दीदा-ए-तर के आगे

अज्ञात

इल्म और दीन

अज्ञात

इश्क़ की गुम-शुदा मंज़िलों में गई

अज्ञात

इश्क़ को अपने लिए समझा असासा दिल का

अज्ञात

इश्क़ को बे-नक़ाब होना था

अज्ञात

इश्क़ छुपता नहीं छुपाने से

अज्ञात

इश्क़ दरिया है गिराँ-बार न जाने कोई

अज्ञात

इश्क़ में ख़ुद से मोहब्बत नहीं की जा सकती

अज्ञात

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए

अज्ञात

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

अज्ञात

इस क़दर टूट कर मिला है कोई

अज्ञात

इस दर्जा इश्क़ मौजिब-ए-रुस्वाई बन गया

अज्ञात

इस भरी दुनिया में कोई भी हमारा न हुआ

अज्ञात

इस से पहले कि कहानी से कहानी निकले

अज्ञात

उजड़ उजड़ के सँवरती है तेरे हिज्र की शाम

अज्ञात

उजड़े हुए लोगों से गुरेज़ाँ न हुआ कर

अज्ञात

उजड़े हुए सहरा को कश्मीर बनाते हैं

अज्ञात

उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए

अज्ञात

उदास हैं सब पता नहीं घर में क्या हुआ है

अज्ञात

उदासियों ने मिरी आत्मा को घेरा है

अज्ञात

उन को जो शुग़्ल-ए-नाज़ से फ़ुर्सत न हो सकी

अज्ञात

उन लबों पर सजी है ख़ामोशी

अज्ञात

उम्र गुज़री रहगुज़र के आस-पास

अज्ञात

उस एक बात का होता रहा मलाल मुझे

अज्ञात

उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा

अज्ञात

उस की आँखों में थी गहराई बहुत

अज्ञात

उस ने जब सीने से लगाना छोड़ दिया

अज्ञात

उस ने हम को गुमान में रक्खा

अज्ञात

उसे बेचैन कर जाऊँगा मैं भी

अज्ञात

एक आईना रू-ब-रू है अभी

अज्ञात

एक गुमाँ का हाल है और फ़क़त गुमाँ में है

अज्ञात

एक पतझड़ सा है लगा मुझ में

अज्ञात

एक बुझाओ एक जलाओ ख़्वाब का क्या है

अज्ञात

एक मुद्दत से उसे देखा नहीं

अज्ञात

एक हों नालाँ क़फ़स में हाए ऐ बुलबुल ख़मोश

अज्ञात

ऐ कू-ए-यार तेरे ज़माने गुज़र गए

अज्ञात

ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो

अज्ञात

ऐ दोस्त! तिरी आँख जो नम है तो मुझे क्या

अज्ञात

ऐ मौत उन्हें भुलाए ज़माने गुज़र गए

अज्ञात

ऐ शरीफ़ इंसानो

ख़ून अपना हो या पराया हो अज्ञात

ऐ सुब्ह मैं अब कहाँ रहा हूँ

अज्ञात

ऐश-ए-उम्मीद ही से ख़तरा है

अज्ञात

ऐसा जीना भी क्या है मर मर के

अज्ञात

ऐसा बना दिया तुझे क़ुदरत ख़ुदा की है

अज्ञात

और क्या चाहिए जीने के लिए

कौन सी शय से है दुनिया तिरी महरूम बता अज्ञात

और क्या चाहिए जीने के लिए

कौन सी शय से है दुनिया तिरी महरूम बता अज्ञात

और तो ख़ैर क्या रह गया

अज्ञात

कुछ को ये ज़िद है कि हम उस को यहीं देखेंगे

अज्ञात

कुछ तो तन्हाई की रातों में सहारा होता

अज्ञात

कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई

अज्ञात

कुछ हर्फ़ ओ सुख़न पहले तो अख़बार में आया

अज्ञात

कड़ी मेहनत है या ये त्याग है या ये तपस्या है

अज्ञात

कतरा के ज़िंदगी से गुज़र जाऊँ क्या करूँ

अज्ञात

क़त्ल छुपते थे कभी संग की दीवार के बीच

अज्ञात

क़ैद में गुज़रेगी जो उम्र बड़े काम की थी

अज्ञात

क़दम-क़दम पे तू ऐ राह-रौ क़याम न कर

अज्ञात

कब उस का विसाल चाहिए था

अज्ञात

कब कहाँ क्या मिरे दिलदार उठा लाएँगे

अज्ञात

कब से आधा है माहताब मिरा

अज्ञात

कभी कभी तो बहुत याद आने लगते हो

अज्ञात

कभी कहा न किसी से तिरे फ़साने को

अज्ञात

कभी गोकुल कभी राधा कभी मोहन बन के

अज्ञात

कभी चराग़ कभी रास्ता बदल कर देख

अज्ञात

कभी तू ने ख़ुद भी सोचा कि ये प्यास है तो क्यूँ है

अज्ञात

कभी तक़्सीर जिस ने की ही नहीं

अज्ञात

कभी फूलों से बहलाया गया हूँ

अज्ञात

कभी लगता है ज़र्रे के बराबर है बिसात अपनी

अज्ञात

क्या तुम को इलाज-ए-दिल-ए-शैदा नहीं आता

अज्ञात

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

अज्ञात

क्या यक़ीं और क्या गुमाँ चुप रह

अज्ञात

क्यों कहीं बैठ के दम लेते नहीं एक घड़ी

किस तरफ़ दौड़े चले जाते हो तुम यूँ सरपट अज्ञात

क़रीब मौत खड़ी है ज़रा ठहर जाओ

अज्ञात

करो दाग़-ए-दिल की सदा पासबानी

अज्ञात

कल चौदहवीं की रात थी शब भर रहा चर्चा तिरा

अज्ञात

कलियाँ चटक रही हैं बहारों की गोद में

अज्ञात

कली

अज्ञात

क़ुव्वत और दीन

अज्ञात

कैसे जानेगा वो मेरे घर का रस्ता

अज्ञात

कैसा दिल और इस के क्या ग़म जी

अज्ञात

कहूँ तो क्या मैं कहूँ प्यारी प्यारी आँखों को

अज्ञात

कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा

अज्ञात

कहीं ऐसा न हो दामन जला लो

अज्ञात

कहीं दिन गुज़र गया है कहीं रात कट गई है

अज्ञात

कहीं बे-ख़याल हो कर युंही छू लिया किसी ने

अज्ञात

कहीं लोग तन्हा कहीं घर अकेले

अज्ञात

किया क्या ऐ 'सदा' तू ने बता आ कर ज़माने में

किया क्या ऐ सदा तू ने बता आ कर ज़माने में अज्ञात

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता-आहिस्ता

अज्ञात

किस के मातम में रो रही है रात

अज्ञात

किस की खोई हुई हँसी थी मैं

अज्ञात

किस को सुनाएँ और कहें क्या किसी से हम

अज्ञात

किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा

अज्ञात

किस तरह प्यास को पानी से अलग रक्खा जाए

अज्ञात

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता

अज्ञात

किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे

अज्ञात

क़िस्मत-ए-शौक़ आज़मा न सके

अज्ञात

किसी की देन है लेकिन मिरी ज़रूरत है

अज्ञात

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई

अज्ञात

किसी से अहद-ओ-पैमाँ कर न रहियो

अज्ञात

किसी से कोई ख़फ़ा भी नहीं रहा अब तो

अज्ञात

किसी सलीम से जब है कोई ख़ता होती

अज्ञात

कोई ख़ुद से सिवा नहीं होता

अज्ञात

कोई भी अरमान नहीं है

अज्ञात

कोई मिलता नहीं ख़ुदा की तरह

अज्ञात

कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा

अज्ञात

कोशिश है शर्त यूँही न हथियार फेंक दे

अज्ञात

कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा

अज्ञात

कौन से शौक़ किस हवस का नहीं

अज्ञात

खंडर जो हो गया ऐसा मकान किस का था

अज्ञात

ख़ुद से रिश्ते रहे कहाँ उन के

अज्ञात

ख़ुदा ने हुस्न दिया तुझ को और जमाल दिया

अज्ञात

ख़ुदा बचाए मोहब्बत की उस बला से भी

अज्ञात

ख़ुदी की तर्बियत

अज्ञात

ख़ून थूकेगी ज़िंदगी कब तक

अज्ञात

ख़ूब है शौक़ का ये पहलू भी

अज्ञात

खुला जब चमन में कुतुब-ख़ाना-ए-गुल

अज्ञात

ख़्वाब के रंग दिल-ओ-जाँ में सजाए भी गए

अज्ञात

ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

अज्ञात

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में

अज्ञात

ख़ुशामद

मैं कार-ए-जहाँ से नहीं आगाह वलेकिन अज्ञात

ख़ुशी मिली तो ये आलम था बद-हवासी का

अज्ञात

ख़ाक उगाती हैं सूरतें क्या क्या

अज्ञात

ख़ामुशी अच्छी नहीं इंकार होना चाहिए

अज्ञात

गए मौसम में जो खिलते थे गुलाबों की तरह

अज्ञात

ग़द्दार

भूक ग़द्दार है अज्ञात

गदाई

अज्ञात

गुफ़्तुगू जब मुहाल की होगी

अज्ञात

ग़म है बे-माजरा कई दिन से

अज्ञात

ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो रह-ए-आम तक न पहुँचे

अज्ञात

गुमाँ का मुमकिन- जो तू है मैं हूँ

करीम सूरज अज्ञात

गुल के होने की तवक़्क़ो' पे जिए बैठी है

अज्ञात

गले मिला न कभी चाँद बख़्त ऐसा था

अज्ञात

गले लगाएँ करें तुम को प्यार ईद के दिन

अज्ञात

गुलाब हाथ में हो आँख में सितारा हो

अज्ञात

गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने

अज्ञात

घर को यूँ तोड़ो कि फिर हसरत-ए-तामीर न हो

अज्ञात

चलते चलते ये गली बे-जान होती जाएगी

अज्ञात

चाँद तक अपनी नज़र का हर सफ़र अच्छा लगा

अज्ञात

चाँद फिर तारों की उजली रेज़गारी दे गया

अज्ञात

चार पल भी जो गुज़र जाते हैं मन-मानी के साथ

अज्ञात

चोट फूलों की छड़ी से भी न क्यों दिल पर लगे

अज्ञात

छुप के उस ने जो ख़ुद-नुमाई की

अज्ञात

छुपता नहीं नक़ाब में जल्वा शबाब का

अज्ञात

छोड़िए आप का इस बात से क्या लेना है

अज्ञात

ज़ख़्म दबे तो फिर नया तीर चला दिया करो

अज्ञात

ज़ख़्म-ए-उम्मीद भर गया कब का

अज्ञात

जग में आ कर इधर उधर देखा

अज्ञात

जुगनू की रौशनी है काशाना-ए-चमन में

अज्ञात

जनाब-ए-शैख़ की हर्ज़ा-सराई जारी है

अज्ञात

जब तिरे नैन मुस्कुराते हैं

अज्ञात

जब मोहब्बत की हद से गुज़र जाऊँगी

अज्ञात

जब से क़रीब हो के चले ज़िंदगी से हम

अज्ञात

जब हिज्र के शहर में धूप उतरी मैं जाग पड़ा तो ख़्वाब हुआ

अज्ञात

ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया

अज्ञात

ज़ब्त कर के हँसी को भूल गया

अज्ञात

ज़बाँ पे हर्फ़ तो इंकार में नहीं आता

अज्ञात

जबीं पे उन की ये बिंदी का दाग़ क्या कहिए

अज्ञात

ज़र्द मौसम के इक शजर जैसी

अज्ञात

जल बुझा हूँ मैं मगर सारा जहाँ ताक में है

अज्ञात

जवाब-ए-शिकवा

दिल से जो बात निकलती है असर रखती है अज्ञात

जुस्तुजू

तुम्हारी ख़ामोश सुलगती साँसों में अज्ञात

जुस्तुजू जिस की थी उस को तो न पाया हम ने

अज्ञात

जहाँ तलक भी ये सहरा दिखाई देता है

अज्ञात

जहाँ से आ गए हैं उस जहाँ की याद आती है

अज्ञात

जहाँ सारे हवा बनने की कोशिश कर रहे थे

अज्ञात

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ

अज्ञात

जाने क्यों कर इस क़दर सहमा हुआ है आईना

अज्ञात

जाने कहाँ गया है वो वो जो अभी यहाँ था

अज्ञात

जानिब-ए-कूचा-ओ-बाज़ार न देखा जाए

अज्ञात

जाम-ए-तही लहराया हम ने

अज्ञात

ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई

अज्ञात

ज़ाहिर तू है तो मैं निहाँ हूँ

अज्ञात

ज़िक्र भी उस से क्या भला मेरा

अज्ञात

ज़िक्र-ए-शब-ए-फ़िराक़ से वहशत उसे भी थी

अज्ञात

ज़िंदगानी जब हमें रास आएगी

अज्ञात

ज़िंदगी के सराब भी देखूँ

अज्ञात

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

अज्ञात

ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं

अज्ञात

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता

अज्ञात

जिस्म के पार वो दिया सा है

अज्ञात

जीवन को दुख दुख को आग और आग को पानी कहते

अज्ञात

ज़ीस्त उनवान तेरे होने का

अज्ञात

जो आलम-ए-ईजाद में है साहब-ए-ईजाद

अज्ञात

जो चूज़े आशियाने में मरे हैं

अज्ञात

जो ज़िंदगी बची है उसे मत गंवाइये

अज्ञात

जो तेज़ दौड़ते थे बहुत जल्द थक गए

अज्ञात

जो बुत है यहाँ अपनी जा एक ही है

अज्ञात

जो बनेगा वही बनाना है

अज्ञात

जो हुआ 'जौन' वो हुआ भी नहीं

अज्ञात

झुँझलाए हैं लजाए हैं फिर मुस्कुराए हैं

अज्ञात

टूटते जिस्म के महताब बिखर जा मुझ में

अज्ञात

डसने लगे हैं ख़्वाब मगर किस से बोलिए

अज्ञात

डासना स्टेशन का मुसाफ़िर

कौन सा स्टेशन है? अज्ञात

तू अगर देखे सादगी मेरी

अज्ञात

तू नहीं तो ज़िंदगी में और क्या रह जाएगा

अज्ञात

तू भी चुप है मैं भी चुप हूँ ये कैसी तन्हाई है

अज्ञात

त'आरुफ़

नहीं मुमकिन मिटाना मुझ को मिस्ल-ए-नक़श-ए-पा यारो अज्ञात

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

अज्ञात

तंग आ चुके हैं कशमकश-ए-ज़िंदगी से हम

अज्ञात

तुझे क्या बताऊँ मैं हम-नशीं मिरी ज़िंदगी का जो हाल है

अज्ञात

तुझ को देखे इक ज़माना हो गया

अज्ञात

तुझ से गिले करूँ तुझे जानाँ मनाऊँ मैं

अज्ञात

तुझ से मिरे ख़ुदा मैं गुज़ारिश करूँ तो क्या

अज्ञात

तुझी को जो याँ जल्वा-फ़रमा न देखा

अज्ञात

तन्हाइयों के दश्त में भागे जो रात भर

अज्ञात

तुम अपना रंज-ओ-ग़म अपनी परेशानी मुझे दे दो

अज्ञात

तुम इंतिज़ार के लम्हे शुमार मत करना

अज्ञात

तुम उस से दूरी भी मत ख़्वाह-मख़ाह में रखना

अज्ञात

तुम को देखा तो ये ख़याल आया

अज्ञात

तुम को भुला रही थी कि तुम याद आ गए

अज्ञात

तुम जिस को ढूँडते हो ये महफ़िल नहीं है वो

अज्ञात

तुम से भी अब तो जा चुका हूँ मैं

अज्ञात

तमन्ना के तार

तमन्ना के ज़ोलीदा तार अज्ञात

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे

अज्ञात

तुम्हारे साथ ये क़िस्सा कभी कभार का है

अज्ञात

तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो

अज्ञात

तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना

अज्ञात

तमाम लहजों में लहजा वही जो प्यार का है

अज्ञात

तेरे आगे सर-कशी दिखलाऊँगा

अज्ञात

तेरे आने का इंतिज़ार रहा

अज्ञात

तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं

अज्ञात

तारीफ़ उस ख़ुदा की जिस ने जहाँ बनाया

अज्ञात

तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार

अज्ञात

तिरे आने का धोका सा रहा है

अज्ञात

तिरे ग़ुरूर का हुलिया बिगाड़ डालूँगा

अज्ञात

तिरे नज़दीक आ कर सोचता हूँ

अज्ञात

तिरे बदन से जो छू कर इधर भी आता है

अज्ञात

तिरी दोस्ती का कमाल था मुझे ख़ौफ़ था न मलाल था

अज्ञात

तिश्नगी ने सराब ही लिक्खा

अज्ञात

तौबा तौबा से नदामत की घड़ी आई है

अज्ञात

दु'आ

दौलत जहाँ की मुझ को तू मेरे ख़ुदा न दे अज्ञात

दुख की गुत्थी खोलेंगे

अज्ञात

देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना

अज्ञात

देखो अभी लहू की इक धार चल रही है

अज्ञात

दुनिया में रह के दुनिया में शामिल नहीं हूँ मैं

अज्ञात

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ

अज्ञात

दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था

अज्ञात

दैर से का'बे को डरते हुए हम जाते हैं

अज्ञात

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर

अज्ञात

दरिया-ए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया

अज्ञात

दसहरा

हर साल जलाते हो रावन अज्ञात

दाएरे से निकाल दे कोई

अज्ञात

दाग़ दुनिया ने दिए ज़ख़्म ज़माने से मिले

अज्ञात

दाम-ए-तहज़ीब

अज्ञात

दामन में आँसुओं का ज़ख़ीरा न कर अभी

अज्ञात

दिल के आँगन में जो दीवार उठा ली जाए

अज्ञात

दिल के कहने पर चल निकला

अज्ञात

दिल के कहने पर चल निकला

अज्ञात

दिल के कहने पर चल निकला

अज्ञात

दिल किसी से भी अगर लगता है

अज्ञात

दिल की तकलीफ़ कम नहीं करते

अज्ञात

दिल की हर बात ध्यान में गुज़री

अज्ञात

दिल को दुनिया का है सफ़र दरपेश

अज्ञात

दिल को रोने के लिए आँख में बस पानी है

अज्ञात

दिल ख़ौफ़ में है आलम-ए-फ़ानी को देख कर

अज्ञात

दिल जो इक जाए थी दुनिया हुई आबाद उस में

अज्ञात

दिल जो है आग लगा दूँ उस को

अज्ञात

दिल तो है एक मगर दर्द के ख़ाने हैं बहुत

अज्ञात

दिल ने अपनी ज़बाँ का पास किया

अज्ञात

दिल ने किया है क़स्द-ए-सफ़र घर समेट लो

अज्ञात

दिल परेशाँ है क्या किया जाए

अज्ञात

दिल में अब यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं

अज्ञात

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

अज्ञात

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

अज्ञात

दिल-ए-बर्बाद को आबाद किया है मैं ने

अज्ञात

दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे

अज्ञात

दो सितारे

अज्ञात

धुआँ बना के फ़ज़ा में उड़ा दिया मुझ को

अज्ञात

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो

अज्ञात

ध्यान में कौन दरिंदा है जो बेदार हुआ

अज्ञात

न आया मज़ा शब की तन्हाइयों में

अज्ञात

न कोई हिज्र न कोई विसाल है शायद

अज्ञात

न जाने कब वो पलट आएँ दर खुला रखना

अज्ञात

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

अज्ञात

न तो जुस्तुजू-ए-दवा-ए-दिल न तो चारागर की तलाश है

अज्ञात

न तो दिल का न जाँ का दफ़्तर है

अज्ञात

न पूछ उस की जो अपने अंदर छुपा

अज्ञात

न मीनार महलों की शौकत बचेगी

अज्ञात

नए कपड़े बदल कर जाऊँ कहाँ और बाल बनाऊँ किस के लिए

अज्ञात

नक़्श की तरह उभरना भी तुम्ही से सीखा

अज्ञात

नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया

अज्ञात

नज़र ने कर दिया ग़ाएब दिखाया दिल ने जो जल्वा

अज्ञात

नफ़रतें दिल से मिटाओ तो कोई बात बने

अज्ञात

नबुव्वत

अज्ञात

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम

अज्ञात

नहीं निबाही ख़ुशी से ग़मी को छोड़ दिया

अज्ञात

नानक

क़ौम ने पैग़ाम-ए-गौतम की ज़रा परवा न की अज्ञात

निगाह ख़ुद पे टिकी थी तो और क्या दिखता

अज्ञात

नींद आई ही नहीं हम को न पूछो कब से

अज्ञात

नींद रातों की उड़ा देते हैं

अज्ञात

पूछ उस से कि मक़्बूल है फ़ितरत की गवाही

अज्ञात

पंजाबी मुसलमान

अज्ञात

पेड़ के पत्तों में हलचल है ख़बर-दार से हैं

अज्ञात

पत्ता पत्ता क्यों है दिल अफ़गार इस गुलज़ार का

अज्ञात

प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

अज्ञात

पानी तिरे चश्मों का तड़पता हुआ सीमाब

अज्ञात

पास अपने इक जान है साईं

अज्ञात

पिछले बरस तुम साथ थे मेरे और दिसम्बर था

अज्ञात

पी पी के जगमगाए ज़माने गुज़र गए

अज्ञात

फ़क़ीरी में ये थोड़ी सी तन-आसानी भी करते हैं

अज्ञात

फ़ज़ा का हब्स शगूफ़ों को बास क्या देगा

अज्ञात

फ़न जो नादार तक नहीं पहुँचा

अज्ञात

फ़राख़-दस्त का ये हुस्न-ए-तंग-दस्ती है

अज्ञात

फूल ने टहनी से उड़ने की कोशिश की

अज्ञात

फूल सब मुरझा गए हैं तितलियाँ ख़ामोश हैं

अज्ञात

फिर कुछ इक दिल को बे-क़रारी है

अज्ञात

फिर भी अपना देश है चंगा

आधा भूका आधा नंगा अज्ञात

फिर से हसीन वक़्त की बस्ती में आ गए

अज्ञात

फिर सुन रहा हूँ गुज़रे ज़माने की चाप को

अज्ञात

बू

अज्ञात

बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं

अज्ञात

बे-ख़बर होते होए भी बा-ख़बर लगते हो तुम

अज्ञात

बचपन का दौर अहद-ए-जवानी में खो गया

अज्ञात

बज़्म से जब निगार उठता है

अज्ञात

बजा इरशाद फ़रमाया गया है

अज्ञात

बुझ गया दिल हयात बाक़ी है

अज्ञात

बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है

अज्ञात

बड़ा एहसान हम फ़रमा रहे हैं

अज्ञात

बद-दिली में बे-क़रारी को क़रार आया तो क्या

अज्ञात

बदन के दीवार-ओ-दर में इक शय सी मर गई है

अज्ञात

बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं

अज्ञात

बन के साया ही सही सात तो होती होगी

अज्ञात

बैर दुनिया से क़बीले से लड़ाई लेते

अज्ञात

बराबर ख़्वाब से चेहरों की हिजरत देखते रहना

अज्ञात

बेवफ़ा मैं भी सही तुझ में वफ़ा भी तो नहीं

अज्ञात

बहुत दिल को कुशादा कर लिया क्या

अज्ञात

बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं

अज्ञात

बहारों का समाँ है और मैं हूँ

अज्ञात

बात कोई उमीद की मुझ से नहीं कही गई

अज्ञात

बात मेरी कभी सुनी ही नहीं

अज्ञात

बारूद के बदले हाथों में आ जाए किताब तो अच्छा हो

अज्ञात

बारिश ख़ुशबू रंग हवा हैं मैं और तू

अज्ञात

बारिशों में अब के याद आए बहुत

अज्ञात

बिखर ही जाऊँगा मैं भी हवा उदासी है

अज्ञात

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा

अज्ञात

बोलने का नहीं चुप रहने का मन चाहता है

अज्ञात

भटकता फिर रहा हूँ जुस्तुजू बिन

अज्ञात

भड़काएँ मिरी प्यास को अक्सर तिरी आँखें

अज्ञात

भर दो झोली मिरी या मोहम्मद लौट कर मैं न जाऊँगा ख़ाली

अज्ञात

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

अज्ञात

भला ये कौन है मेरे ही अंदर मुझ से रंजिश में

अज्ञात

भला ये कौन है मेरे ही अंदर मुझ से रंजिश में

अज्ञात

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

अज्ञात

मैं उसे देख रही हूँ बड़ी हैरानी से

अज्ञात

मैं किन लोगों से मिलना चाहती थी

अज्ञात

मैं छू सकूँ तुझे मेरा ख़याल-ए-ख़ाम है क्या

अज्ञात

मैं जब वजूद के हैरत-कदे से मिल रहा था

अज्ञात

मैं दिल पे जब्र करूँगा तुझे भुला दूँगा

अज्ञात

मैं ने पूछा पहला पत्थर मुझ पर कौन उठाएगा

अज्ञात

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में

अज्ञात

मैं हूँ हैराँ ये सिलसिला क्या है

अज्ञात

मंज़र शमशान हो गया है

अज्ञात

मंज़र-ए-रुख़्सत-ए-दिलदार भुलाया न गया

अज्ञात

मुझे किसी ने बताया ख़ुदा है मेरे साथ

अज्ञात

मुझ को तो गिर के मरना है

अज्ञात

मुझे ख़बर है रुलाएगी ज़ार-ज़ार मुझे

अज्ञात

मुझे ग़रज़ है मिरी जान ग़ुल मचाने से

अज्ञात

मुझे तुम शोहरतों के दरमियाँ गुमनाम लिख देना

अज्ञात

मुझे वो कुंज-ए-तन्हाई से आख़िर कब निकालेगा

अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से मिलने शब-ए-ग़म और तो कौन आएगा

अज्ञात

मुझे सहल हो गईं मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गए

अज्ञात

मुतमइन बैठा हूँ ख़ुद को जान कर

अज्ञात

मद्धम हुई तो और निखरती चली गई

अज्ञात

मदरसा

अज्ञात

मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था

अज्ञात

मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हें हो जाएगा

अज्ञात

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख

अज्ञात

मरहूम की याद में

अज्ञात

मेरी आँखों में आ गए आँसू

अज्ञात

मेरी आँखों में तिरे प्यार का आँसू आए

अज्ञात

मेरी चाहत की बहुत लम्बी सज़ा दो मुझ को

अज्ञात

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

अज्ञात

मंसूब चराग़ों से तरफ़-दार हवा के

अज्ञात

मायूस किस लिए हो उठो बात करते हैं

अज्ञात

मियाँ वो जान कतराने लगी है

अज्ञात

मिरे ग़म के लिए इस बज़्म में फ़ुर्सत कहाँ पैदा

अज्ञात

मिरे दिमाग़ पे आसेब का असर तो नहीं

अज्ञात

मिरे दिल से दिल को मिला कर तो देखो

अज्ञात

मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है

अज्ञात

मिरे हमदम मिरे दोस्त!

गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्त अज्ञात

मिरे हमदम मिरे दोस्त!

गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्त अज्ञात

मिरी तरह का कोई शख़्स मर गया मुझ में

अज्ञात

मिरी तौबा जो टूटी है शरारत सब फ़ज़ा की है

अज्ञात

मिरी दास्ताँ मुझे ही मिरा दिल सुना के रोए

अज्ञात

मिरी दास्तान-ए-हसरत वो सुना सुना के रोए

अज्ञात

मिरी मोहब्बत भी नीलगूं है

अज्ञात

मिल कर जुदा हुए तो न सोया करेंगे हम

अज्ञात

मिलेगा मंज़िल-ए-मक़्सूद का उसी को सुराग़

अज्ञात

मिलते जुलते हैं यहाँ लोग ज़रूरत के लिए

अज्ञात

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

अज्ञात

मिली दिल की अपने ख़बर सनम तुझे दिल में जब से बसा लिया

अज्ञात

मिस्ल-ए-फ़ानूस गुल-अंदाम को रौशन करने

अज्ञात

मोहब्बत और मोहब्बत का शजर बाक़ी रहेगा

अज्ञात

मोहब्बत करने वाले कम न होंगे

अज्ञात

मोहब्बत किस से कब हो जाए अंदाज़ा नहीं होता

अज्ञात

मोहब्बत ना-समझ होती है समझाना ज़रूरी है

अज्ञात

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला

अज्ञात

ये अजब साअत-ए-रुख़्सत है कि डर लगता है

अज्ञात

ये आँसू बे-सबब जारी नहीं है

अज्ञात

ये क्या जगह है दोस्तो ये कौन सा दयार है

अज्ञात

ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ

अज्ञात

ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को

अज्ञात

ये कार-ए-ज़िंदगी था तो करना पड़ा मुझे

अज्ञात

ये किस का गुमाँ है तसव्वुर से आगे

अज्ञात

ये कौन आ गई दिल-रुबा महकी महकी

अज्ञात

ये ख़बर भी छापिएगा आज के अख़बार में

अज्ञात

ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ

अज्ञात

ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ

अज्ञात

ये ग़ज़ाल सी निगाहें ये शबाब ये अदाएँ

अज्ञात

ये ज़ुल्फ़ अगर खुल के बिखर जाए तो अच्छा

अज्ञात

ये जो तन्हाई मिली आँख में धरने के लिए

अज्ञात

यूँ तेरी रहगुज़र से दीवाना-वार गुज़रे

अज्ञात

यूँ तो आशिक़ तिरा ज़माना हुआ

अज्ञात

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अज्ञात

ये पैहम तल्ख़-कामी सी रही क्या

अज्ञात

ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो

अज्ञात

ये मेरे पास जो चुप-चाप आए बैठे हैं

अज्ञात

ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए

अज्ञात

ये शो'ले आज़माना जानते हैं

अज्ञात

यकुम जनवरी है नया साल है

अज्ञात

या रब ये जहान-ए-गुज़राँ ख़ूब है लेकिन

अज्ञात

याद उसे इंतिहाई करते हैं

अज्ञात

यादों का हिसाब रख रहा हूँ

अज्ञात

यार भी राह की दीवार समझते हैं मुझे

अज्ञात

रुख़्सत हुआ तो आँख मिला कर नहीं गया

अज्ञात

रुख़्सत हुआ तो बात मिरी मान कर गया

अज्ञात

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

अज्ञात

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

अज्ञात

रू-ब-रू फिर से उस की आँखें थीं

अज्ञात

रूमी बदले शामी बदले बदला हिंदुस्तान

अज्ञात

रस उन आँखों का है कहने को ज़रा सा पानी

अज्ञात

रह-ए-जुनूँ में चला यूँ मैं उम्र-भर तन्हा

अज्ञात

रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह

अज्ञात

राह-ए-हक़ में तुझे हस्ती को मिटाना होगा

अज्ञात

रिंदों को भी मा'लूम हैं सूफ़ी के कमालात

अज्ञात

रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं

अज्ञात

रोते हैं सुन के कहानी मेरी

अज्ञात

लगी है चोट जो दिल में उभर आई तो क्या होगा

अज्ञात

लुटा दिए थे कभी जो ख़ज़ाने ढूँढते हैं

अज्ञात

लफ़्ज़-ओ-मंज़र में मआनी को टटोला न करो

अज्ञात

लम्हे लम्हे की ना-रसाई है

अज्ञात

लाख तक़दीर पे रोए कोई रोने वाला

अज्ञात

लाज़िम है अपने आप की इमदाद कुछ करूँ

अज्ञात

लिख दिया अपने दर पे किसी ने इस जगह प्यार करना मना है

अज्ञात

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

अज्ञात

वजूद पर इंहिसार मैं ने नहीं किया था

अज्ञात

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

अज्ञात

विदा करता है दिल सतवत-ए-रग-ए-जाँ को

अज्ञात

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

अज्ञात

वो एक नज़र में मुझे पहचान गया है

अज्ञात

वो क्या कुछ न करने वाले थे

अज्ञात

वो क्या ज़िंदगी जिस में जोशिश नहीं

अज्ञात

वो जो था वो कभी मिला ही नहीं

अज्ञात

वो जो मेरे पास से हो कर किसी के घर गया

अज्ञात

वो तो ख़ुश-बू है हवाओं में बिखर जाएगा

अज्ञात

वो तो मैं आग जलाने से मियाँ वाक़िफ़ था

अज्ञात

वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी

अज्ञात

वो नबियों में रहमत लक़ब पाने वाला

अज्ञात

वो भूल गया मुझ से बरसों की शनासाई

अज्ञात

वो मज़ा रखते हैं कुछ ताज़ा फ़साने अपने

अज्ञात

वो मेरे बारे में ऐसे भी सोचता कब था

अज्ञात

वो लब कि जैसे साग़र-ए-सहबा दिखाई दे

अज्ञात

वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

अज्ञात

वो हमनशीं था मगर ऐसे ना-शनास रहा

अज्ञात

वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी

अज्ञात

शब को था वो किसी की बाँहों में

अज्ञात

शब वही लेकिन सितारा और है

अज्ञात

शब-गज़ीदा के घर नहीं आती

अज्ञात

शबनम है कि धोका है कि झरना है कि तुम हो

अज्ञात

शम्-ए-तन्हा की तरह सुब्ह के तारे जैसे

अज्ञात

शमशीर मेरी, मेरी सिपर किस के पास है

अज्ञात

शाम अच्छी है न सहर अच्छी

अज्ञात

शाम थी और बर्ग-ओ-गुल शल थे मगर सबा भी थी

अज्ञात

शाम से आँख में नमी सी है

अज्ञात

शाम से आज साँस भारी है

अज्ञात

शाम हुई है यार आए हैं यारों के हमराह चलें

अज्ञात

शौक़ के दफ़्तर दिलों में रह गए

अज्ञात

शौक़-ए-रक़्स से जब तक उँगलियाँ नहीं खुलतीं

अज्ञात

सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम

अज्ञात

सफ़र के ब'अद भी मुझ को सफ़र में रहना है

अज्ञात

सफ़र के बा'द भी ज़ौक़-ए-सफ़र न रह जाए

अज्ञात

सफ़ीर-ए-लैला-1

सफ़ीर-ए-लैला यही खंडर हैं जहाँ से आग़ाज़-ए-दास्ताँ है अज्ञात

सब से प्यारा है प्यार का रिश्ता

अज्ञात

सुब्ह

अज्ञात

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

अज्ञात

समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा

अज्ञात

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

अज्ञात

सर में सौदा भी नहीं दिल में तमन्ना भी नहीं

अज्ञात

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

अज्ञात

सर-ए-सहरा हबाब बेचे हैं

अज्ञात

सर्द जज़्बे बुझे बुझे चेहरे

अज्ञात

सरमाया-दारी

कलेजा फुंक रहा है और ज़बाँ कहने से आरी है अज्ञात

सुलगती रेत पे आँखें भी ज़ेर-ए-पा रखना

अज्ञात

सुलगती शाम की दहलीज़ पर जलता दिया रखना

अज्ञात

सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना

अज्ञात

सँवार नोक-पलक अबरुओं में ख़म कर दे

अज्ञात

सहरिश-ए-गुल के इस्ति'आरे हैं

अज्ञात

सहो बेचारगी का दुख

अज्ञात

साक़ी

अज्ञात

सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए'तिबार आप के वा'दे पर कर लिया

अज्ञात

सामने वाले को हल्का जान कर भारी हैं आप

अज्ञात

सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है

अज्ञात

सितम हो जाए तम्हीद-ए-करम ऐसा भी होता है

अज्ञात

सियासी पेशवा

अज्ञात

सिलसिला यूँ भी रवा रक्खा शनासाई का

अज्ञात

सिसकती रुत को महकता गुलाब कर दूँगा

अज्ञात

सीने में उन के जल्वे छुपाए हुए तो हैं

अज्ञात

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

अज्ञात

सोचा है कि अब कार-ए-मसीहा न करेंगे

अज्ञात

सोज़-ए-ग़म दे के मुझे उस ने ये इरशाद किया

अज्ञात

सोज़-ए-ग़म-ए-फ़िराक़ से दिल को बचाए कौन

अज्ञात

है आरज़ू कि और तो क्या ख़ुद ख़ुदा न हो

अज्ञात

है कहाँ का इरादा तुम्हारा सनम किस के दिल को अदाओं से बहलाओगे

अज्ञात

है फ़सीलें उठा रहा मुझ में

अज्ञात

है बिखरने को ये महफ़िल-ए-रंग-ओ-बू तुम कहाँ जाओगे हम कहाँ जाएँगे

अज्ञात

है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी

अज्ञात

हक़ की है गर तलाश तो ये मान कर चलो

अज्ञात

हक़ीक़त-ए-अज़ली है रक़ाबत-ए-अक़्वाम

अज्ञात

हम आँधियों के बन में किसी कारवाँ के थे

अज्ञात

हम आप क़यामत से गुज़र क्यूँ नहीं जाते

अज्ञात

हम उन के दर पे न जाते तो और क्या करते

अज्ञात

हम को किस के ग़म ने मारा ये कहानी फिर सही

अज्ञात

हम जी रहे हैं कोई बहाना किए बग़ैर

अज्ञात

हम जो पहुँचे सर-ए-मक़्तल तो ये मंज़र देखा

अज्ञात

हम तिरा हिज्र मनाने के लिए निकले हैं

अज्ञात

हम तो जैसे वहाँ के थे ही नहीं

अज्ञात

हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए

अज्ञात

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है

अज्ञात

हम बहुत दूर निकल आए हैं चलते चलते

अज्ञात

हमें भी मुस्कुराना चाहिए था

अज्ञात

हमारे बा'द अब महफ़िल में अफ़्साने बयाँ होंगे

अज्ञात

हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाए

अज्ञात

हमारी तहरीरें वारदातें बहुत ज़माने के बाद होंगी

अज्ञात

हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना

अज्ञात

हयात-ए-अबदी

अज्ञात

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

अज्ञात

''हर तमन्ना दिल से रुख़्सत हो गई''

अज्ञात

हर तरफ़ यार का तमाशा है

अज्ञात

हर धड़कन हैजानी थी हर ख़ामोशी तूफ़ानी थी

अज्ञात

हर रोज़ जो मर जाने का ए'लान करो हो

अज्ञात

हैरत है जिन्हें मेरी तरक़्क़ी पे जलन भी

अज्ञात

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए

अज्ञात

हल्क़े में रसूलों के वो माह-ए-मदनी है

अज्ञात

हवा का लम्स जो अपने किवाड़ खोलता है

अज्ञात

हँसते-हँसते न सही रो के ही कट जाने दो

अज्ञात

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं

अज्ञात

हुस्न पर जब शबाब आता है

अज्ञात

हुस्न फिर फ़ित्नागर है क्या कहिए

अज्ञात

हँसने वाले अब एक काम करें

अज्ञात

हाथ हाथों में न दे बात ही करता जाए

अज्ञात

हालात से ख़ौफ़ खा रहा हूँ

अज्ञात

हिज्र का रंज घटे ऐसी दु'आ जानता है

अज्ञात

हिज्र की आँखों से आँखें तो मिलाते जाइए

अज्ञात

हिजाब दूर तुम्हारा शबाब कर देगा

अज्ञात

हो जाएगी जब तुम से शनासाई ज़रा और

अज्ञात

होंटों पे मोहर भी नहीं नग़्मात भी नहीं

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

अज्ञात

1919 की एक बात

अज्ञात

Based on Sadat Hassan Manto's short story "Thanda Gosht"

अज्ञात

Buu

अज्ञात

jab teri samundar aankhon mein

ये धूप किनारा शाम ढले अज्ञात

KHatm hui barish-e-sang

ना-गहाँ आज मिरे तार-ए-नज़र से कट कर अज्ञात

Khol do

अज्ञात

Khol Do (Photo Story)

अज्ञात

KHuda wo waqt na lae

ख़ुदा वो वक़्त न लाए कि सोगवार हो तू अज्ञात

kya karen

मिरी तिरी निगाह में अज्ञात

lauh-o-qalam

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे अज्ञात

main tere sapne dekhun

अज्ञात

mere dard ko jo zaban mile

मिरा दर्द नग़मा-ए-बे-सदा अज्ञात

mere hamdam mere dost

गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मिरे दोस्त अज्ञात

mere hi lahu par guzar auqat karo ho

अज्ञात

Piran

अज्ञात

shishon ka masiha koi nahin

मोती हो कि शीशा जाम कि दुर अज्ञात

tin aawazen - Part 2

ज़ालिम अज्ञात

tum apni karni kar guzro

अब क्यूँ उस दिन का ज़िक्र करो अज्ञात

Zihaal-e-Miskeen - Sannata Soundtrack

अज्ञात

अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं

अज्ञात

अक़्ल गो आस्ताँ से दूर नहीं

अज्ञात

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

अज्ञात

अगर यूँ ही ये दिल सताता रहेगा

अज्ञात

अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए

अज्ञात

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अज्ञात

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अज्ञात

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अज्ञात

अंधा कबाड़ी

शहर के गोशों में हैं बिखरे हुए अज्ञात

अनार कली

अज्ञात

अपने को तलाश कर रहा हूँ

अज्ञात

अपने सब यार काम कर रहे हैं

अज्ञात

अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को

अज्ञात

अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को

अज्ञात

अपने हाथों की लकीरों में सजा ले मुझ को

अज्ञात

अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाए

अज्ञात

अपनी तन्हाई मिरे नाम पे आबाद करे

अज्ञात

अपनी धुन में रहता हूँ

अज्ञात

अपनी रुस्वाई तिरे नाम का चर्चा देखूँ

अज्ञात

अब आएँ या न आएँ इधर पूछते चलो

अज्ञात

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

अज्ञात

अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएँगे

अज्ञात

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास

अज्ञात

अब्जी डूडू

अज्ञात

अभी इक शोर सा उठा है कहीं

अज्ञात

अभी तो मैं जवान हूँ

हवा भी ख़ुश-गवार है अज्ञात

अभी हमारी मोहब्बत किसी को क्या मालूम

अज्ञात

अल्लाह दत्ता

अज्ञात

अश्क-ए-रवाँ की नहर है और हम हैं दोस्तो

अज्ञात

असर उस को ज़रा नहीं होता

अज्ञात

असर करे न करे सुन तो ले मिरी फ़रियाद

अज्ञात

असली जिन

अज्ञात

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

अज्ञात

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ

अज्ञात

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

अज्ञात

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

अज्ञात

आँखें

अज्ञात

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

अज्ञात

आख़िरी सल्यूट

अज्ञात

आँखों पर चर्बी

अज्ञात

आँखों में जल रहा है प बुझता नहीं धुआँ

अज्ञात

आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए

अज्ञात

आँखों से हया टपके है अंदाज़ तो देखो

अज्ञात

आग़ाज़ तो होता है अंजाम नहीं होता

अज्ञात

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी

आज की शब तो किसी तौर गुज़र जाएगी अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज जाने की ज़िद न करो

अज्ञात

आज तो बे-सबब उदास है जी

अज्ञात

आप की याद आती रही रात भर

अज्ञात

आप की याद आती रही रात भर

अज्ञात

आप की याद आती रही रात भर

अज्ञात

आप जिन के क़रीब होते हैं

अज्ञात

आप जिन के क़रीब होते हैं

अज्ञात

आप जिन के क़रीब होते हैं

अज्ञात

आप जिन के क़रीब होते हैं

अज्ञात

आम

अज्ञात

आरज़ू है वफ़ा करे कोई

अज्ञात

आर्टिस्ट लोग

अज्ञात

आवारा

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ अज्ञात

आवारा

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ अज्ञात

आवारा

शहर की रात और मैं नाशाद ओ नाकारा फिरूँ अज्ञात

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

अज्ञात

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

अज्ञात

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अज्ञात

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो

अज्ञात

आहट सी कोई आए तो लगता है कि तुम हो

अज्ञात

इक दानिश-ए-नूरानी इक दानिश-ए-बुरहानी

अज्ञात

इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए

अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इक शहंशाह ने बनवा के....

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताज-महल अज्ञात

इतना मालूम है!

अपने बिस्तर पे बहुत देर से मैं नीम-दराज़ अज्ञात

इंतिसाब

आज के नाम अज्ञात

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई

अज्ञात

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही

अज्ञात

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

अज्ञात

इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी

अज्ञात

इसी में ख़ुश हूँ मिरा दुख कोई तो सहता है

अज्ञात

उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्या

अज्ञात

उर्दू

हमारी प्यारी ज़बान उर्दू अज्ञात

उस का अपना ही करिश्मा है फ़ुसूँ है यूँ है

अज्ञात

एक ख़त

अज्ञात

एक रह-गुज़र पर

वो जिस की दीद में लाखों मसर्रतें पिन्हाँ अज्ञात

एक लड़का

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों अज्ञात

एक साया मिरा मसीहा था

अज्ञात

एक ही मुज़्दा सुब्ह लाती है

अज्ञात

ऐ ज़ब्त देख 'इश्क़ की उन को ख़बर न हो

अज्ञात

औरत ज़ात

अज्ञात

औलाद

अज्ञात

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया

कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया अज्ञात

कुत्ते

ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्ते अज्ञात

कुत्ते

ये गलियों के आवारा बे-कार कुत्ते अज्ञात

कनार-ए-आब खड़ा ख़ुद से कह रहा है कोई

अज्ञात

कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की

अज्ञात

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अज्ञात

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

अज्ञात

कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी मिटे मिटे से

अज्ञात

कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

अज्ञात

कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा

अज्ञात

कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं

अज्ञात

कमाल-ए-ज़ब्त को ख़ुद भी तो आज़माऊँगी

अज्ञात

क्या क्या न रंग तेरे तलबगार ला चुके

अज्ञात

क्या करें

मिरी तिरी निगाह में अज्ञात

करोगे याद तो हर बात याद आएगी

करोगे याद तो हर बात याद आएगी अज्ञात

कहाँ आँसुओं की ये सौग़ात होगी

अज्ञात

किन लफ़्ज़ों में इतनी कड़वी इतनी कसीली बात लिखूँ

अज्ञात

किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे

अज्ञात

किस से इज़हार-ए-मुद्दआ कीजे

अज्ञात

कोई उम्मीद बर नहीं आती

अज्ञात

कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है

अज्ञात

कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे

अज्ञात

कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे

अज्ञात

कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे

अज्ञात

कौन कहता है मोहब्बत की ज़बाँ होती है

अज्ञात

ख़ुदा असर से बचाए इस आस्ताने को

अज्ञात

ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं

अज्ञात

खुली आँखों में सपना झाँकता है

अज्ञात

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया

अज्ञात

ख़िरद के पास ख़बर के सिवा कुछ और नहीं

अज्ञात

गुफ़्तुगू (हिन्द पाक दोस्ती के नाम)

गुफ़्तुगू बंद न हो अज्ञात

ग़म्ज़ा नहीं होता कि इशारा नहीं होता

अज्ञात

गर्द-ए-सफ़र में राह ने देखा नहीं मुझे

अज्ञात

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

अज्ञात

गाहे गाहे बस अब यही हो क्या

अज्ञात

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया

अज्ञात

घटा है बाग़ है मय है सुबू है जाम है साक़ी

अज्ञात

चंद रोज़ और मिरी जान

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ अज्ञात

चाँदनी छत पे चल रही होगी

अज्ञात

जड़ें

अज्ञात

जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है

अज्ञात

जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही

अज्ञात

जब रन में सर-बुलंद अली का अलम हुआ

अज्ञात

ज़माना ख़ुदा है

''ज़माना ख़ुदा है उसे तुम बुरा मत कहो'' अज्ञात

ज़रा सी धूप ज़रा सी नमी के आने से

अज्ञात

ज़ुल्फ़ें सीना नाफ़ कमर

अज्ञात

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना अज्ञात

जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं

अज्ञात

ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ

अज्ञात

ज़िंदगी से डरते हो

ज़िंदगी से डरते हो! अज्ञात

ज़िंदगी से डरते हो

ज़िंदगी से डरते हो! अज्ञात

ज़िंदाँ की एक शाम

शाम के पेच-ओ-ख़म सितारों से अज्ञात

जिस सम्त भी देखूँ नज़र आता है कि तुम हो

अज्ञात

जी ही जी में वो जल रही होगी

अज्ञात

जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा

अज्ञात

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं

अज्ञात

तू अगर सैर को निकले

तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए अज्ञात

तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है

अज्ञात

तू जब मेरे घर आया था

अज्ञात

तुम पूछो और मैं न बताऊँ ऐसे तो हालात नहीं

अज्ञात

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

अज्ञात

तराना-ए-हिन्दी

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा अज्ञात

तेरी ख़ुश्बू का पता करती है

अज्ञात

तेरी सूरत जो दिल-नशीं की है

अज्ञात

तस्वीर-ए-दर्द

नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी अज्ञात

तारिक़ की दुआ

(उंदुलुस के मैदान-ए-जंग में) अज्ञात

तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ

अज्ञात

देख तो दिल कि जाँ से उठता है

अज्ञात

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

अज्ञात

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं

अज्ञात

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं

अज्ञात

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं

अज्ञात

दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों

अज्ञात

दिल चुरा कर नज़र चुराई है

अज्ञात

दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं

अज्ञात

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

अज्ञात

दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ

अज्ञात

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

अज्ञात

दिल-ए-मन मुसाफ़िर-ए-मन

मिरे दिल, मिरे मुसाफ़िर अज्ञात

दो हाथ

अज्ञात

धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो

अज्ञात

न आते हमें इस में तकरार क्या थी

अज्ञात

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ

अज्ञात

न तू ज़मीं के लिए है न आसमाँ के लिए

अज्ञात

न तख़्त-ओ-ताज में ने लश्कर-ओ-सिपाह में है

अज्ञात

नदी ने धूप से क्या कह दिया रवानी में

अज्ञात

नन्ही पुजारन

इक नन्ही मुन्नी सी पुजारन अज्ञात

नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हम

अज्ञात

नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं

अज्ञात

नूरा

वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियम अज्ञात

नूरा

वो नौ-ख़ेज़ नूरा वो इक बिन्त-ए-मरियम अज्ञात

निय्यत-ए-शौक़ भर न जाए कहीं

अज्ञात

नींद आँखों से उड़ी फूल से ख़ुश्बू की तरह

अज्ञात

नौ-जवान ख़ातून से

हिजाब-ए-फ़ित्ना-परवर अब उठा लेती तो अच्छा था अज्ञात

नौ-जवान से

जलाल-ए-आतिश-ओ-बर्क़-ओ-सहाब पैदा कर अज्ञात

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

अज्ञात

पाँव से लहू को धो डालो

हम क्या करते किस रह चलते अज्ञात

फ़र्ज़ करो

फ़र्ज़ करो हम अहल-ए-वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों अज्ञात

फूल मुरझा गए सारे

फूल मुरझा गए हैं सारे अज्ञात

फ़ितरत को ख़िरद के रू-ब-रू कर

अज्ञात

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर

अज्ञात

बे-क़रारी सी बे-क़रारी है

अज्ञात

बग़ैर उस के अब आराम भी नहीं आता

अज्ञात

बचनी

अज्ञात

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा अज्ञात

बंजारा-नामा

टुक हिर्स-ओ-हवा को छोड़ मियाँ मत देस बिदेस फिरे मारा अज्ञात

बुझा दिए हैं ख़ुद अपने हाथों मोहब्बतों के दिए जला के

अज्ञात

बदसूरती

अज्ञात

बदसूरती

अज्ञात

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता

अज्ञात

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता

अज्ञात

बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता

अज्ञात

बर्क़-ए-कलीसा

अज्ञात

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

अज्ञात

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

अज्ञात

बात मेरी कभी सुनी ही नहीं

अज्ञात

बादशाहत का ख़ात्मा

अज्ञात

बाबू गोपीनाथ

अज्ञात

बारिश

अज्ञात

बिंदराबन के कृष्ण-कन्हैया अल्लाह-हू

अज्ञात

बीमार

अज्ञात

बीमार-ए-मोहब्बत की दवा है कि नहीं है

अज्ञात

भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं

अज्ञात

मआल-ए-सोज़-ए-ग़म-हा-ए-निहानी देखते जाओ

अज्ञात

मजनूँ ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे

अज्ञात

मुजरिम

यही रस्ता मिरी मंज़िल की तरफ़ जाता है अज्ञात

मुझ से ऊँचा तिरा क़द है, हद है

अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग अज्ञात

मता-ए-बे-बहा है दर्द-ओ-सोज़-ए-आरज़ूमंदी

अज्ञात

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख

अज्ञात

मुशीर

मैं ने उस से ये कहा अज्ञात

मुसलमाँ के लहू में है सलीक़ा दिल-नवाज़ी का

अज्ञात

मिट्टी का दिया

झुटपुटे के वक़्त घर से एक मिट्टी का दिया अज्ञात

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता

अज्ञात

मिटा दिया मिरे साक़ी ने आलम-ए-मन-ओ-तू

अज्ञात

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

अज्ञात

मोहब्बत का असर जाता कहाँ है

अज्ञात

मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं

अज्ञात

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता

अज्ञात

यक़ीन का अगर कोई भी सिलसिला नहीं रहा

अज्ञात

रक़्स

ऐ मिरी हम-रक़्स मुझ को थाम ले अज्ञात

रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग ख़त्म पर आई

अज्ञात

रंग बे-रंग हों ख़ुशबू का भरोसा जाए

अज्ञात

रस्ता भी कठिन धूप में शिद्दत भी बहुत थी

अज्ञात

रात और रेल

फिर चली है रेल स्टेशन से लहराती हुई अज्ञात

रात और रेल

फिर चली है रेल स्टेशन से लहराती हुई अज्ञात

रात के बा'द नए दिन की सहर आएगी

अज्ञात

रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं

अज्ञात

रौशनी मुझ से गुरेज़ाँ है तो शिकवा भी नहीं

अज्ञात

ले उड़ा फिर कोई ख़याल हमें

अज्ञात

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

अज्ञात

लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता

अज्ञात

लाओ तो क़त्ल-नामा मिरा

सुनने को भीड़ है सर-ए-महशर लगी हुई अज्ञात

लिहाफ़

अज्ञात

वतन का राग

भारत प्यारा देश हमारा सब देशों से न्यारा है अज्ञात

व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)

हम देखेंगे अज्ञात

व-यबक़ा-वज्ह-ओ-रब्बिक (हम देखेंगे)

हम देखेंगे अज्ञात

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अज्ञात

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अज्ञात

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अज्ञात

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अज्ञात

वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे

अज्ञात

वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे

अज्ञात

वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे

अज्ञात

वो दिल ही क्या तिरे मिलने की जो दुआ न करे

अज्ञात

वो मजबूरी नहीं थी ये अदाकारी नहीं है

अज्ञात

शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए

अज्ञात

शौक़ से नाकामी की बदौलत कूचा-ए-दिल ही छूट गया

अज्ञात

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अज्ञात

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अज्ञात

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अज्ञात

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

अज्ञात

सब कहाँ कुछ लाला-ओ-गुल में नुमायाँ हो गईं

अज्ञात

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ

अज्ञात

सर ही अब फोड़िए नदामत में

अज्ञात

साए

किसी साए का नक़्श गहरा नहीं है अज्ञात

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अज्ञात

सितारों से उलझता जा रहा हूँ

अज्ञात

सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई

अज्ञात

है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ

अज्ञात

हज़ार ख़ौफ़ हो लेकिन ज़बाँ हो दिल की रफ़ीक़

अज्ञात

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

अज्ञात

हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं

तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन अज्ञात

हम ने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर

अज्ञात

हम बाग़-ए-तमन्ना में दिन अपने गुज़ार आए

अज्ञात

हम भी शाइ'र थे कभी जान-ए-सुख़न याद नहीं

अज्ञात

हमेशा देर कर देता हूँ

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में अज्ञात

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है

अज्ञात

हर एक शब यूँही देखेंगी सू-ए-दर आँखें

अज्ञात

हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए

अज्ञात

हार्ट-अटैक

दर्द इतना था कि उस रात दिल-ए-वहशी ने अज्ञात

हिन्दुस्तानी बच्चों का क़ौमी गीत

चिश्ती ने जिस ज़मीं में पैग़ाम-ए-हक़ सुनाया अज्ञात

होली

आ धमके ऐश ओ तरब क्या क्या जब हुस्न दिखाया होली ने अज्ञात

ruk gaya aankh se behta hua dariya kaise

अज्ञात

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