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फ़ारिग़ बुख़ारी

1917 - 1997 | पाकिस्तान

ग़ज़ल 35

नज़्म 3

 

शेर 18

सफ़र में कोई किसी के लिए ठहरता नहीं

मुड़ के देखा कभी साहिलों को दरिया ने

कितने शिकवे गिले हैं पहले ही

राह में फ़ासले हैं पहले ही

दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं

दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाते हैं

पुस्तकें 8

Be Chehra Sawal

 

1987

ग़ज़लिया

 

1983

Ghazliya

 

1983

Ghazliya

 

1983

Khushhal Khan ke Afkar

 

 

मोहब्बतों के निगार ख़ाने

 

1987

Pashto Shairi

 

1966

Pyase Hath

 

1982

 

चित्र शायरी 2

याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए जैसे बोसीदा किताबें हों हवालों के लिए देख यूँ वक़्त की दहलीज़ से टकरा के न गिर रास्ते बंद नहीं सोचने वालों के लिए आओ ता'मीर करें अपनी वफ़ा का मअ'बद हम न मस्जिद के लिए हैं न शिवालों के लिए सालहा-साल अक़ीदत से खुला रहता है मुनफ़रिद राहों का आग़ोश जियालों के लिए रात का कर्ब है गुलबाँग-ए-सहर का ख़ालिक़ प्यार का गीत है ये दर्द उजालों के लिए शब-ए-फ़ुर्क़त में सुलगती हुई यादों के सिवा और क्या रक्खा है हम चाहने वालों के लिए