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फ़ारिग़ बुख़ारी

1917 - 1997 | पाकिस्तान

फ़ारिग़ बुख़ारी

ग़ज़ल 36

नज़्म 5

 

अशआर 19

सफ़र में कोई किसी के लिए ठहरता नहीं

मुड़ के देखा कभी साहिलों को दरिया ने

याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए

जैसे बोसीदा किताबें हों हवालों के लिए

कितने शिकवे गिले हैं पहले ही

राह में फ़ासले हैं पहले ही

नई मंज़िल का जुनूँ तोहमत-ए-गुमराही है

पा-शिकस्ता भी तिरी राह में कहलाया हूँ

दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं

दोनों अपनी अपनी प्यास बुझाते हैं

पुस्तकें 14

चित्र शायरी 2

 

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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