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एहसास पर शेर

शायरी में एहसास और भावना

को कई सतहों पर पेश किया गया है । साहित्य में भाषा या ज़बान के संदर्भ में बड़ी बात ये हॊती है कि लफ़्ज़ अपने शाब्दिक अर्थ से कही आगे निकल जाता है और हम अर्थों की ऐसी दुनिया में होते हैं जिसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है । ये एहसास स्वयं रचनाकार का हो सकता है और पाठक का भी । यहाँ प्रस्तुत शायरी में देखिए कि एक शायर अपनी कल्पना-शक्ति और रचनात्मकता के बल पर किस तरह जीवन के ना-मालूम किनारों को भाषा की एक नई शैली में ढालता है । एसास की शिद्दत किसी भी रचना में क्या भूमिका अदा कर सकती है उसका अंदाज़ा यहाँ प्रस्तुत चुनिंदा शायरी से लगाया जा सकता है ।

अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को

मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं

आसी उल्दनी

ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है

रहे सामने और दिखाई न दे

बशीर बद्र

तकलीफ़ मिट गई मगर एहसास रह गया

ख़ुश हूँ कि कुछ न कुछ तो मिरे पास रह गया

अब्दुल हमीद अदम

आगही कर्ब वफ़ा सब्र तमन्ना एहसास

मेरे ही सीने में उतरे हैं ये ख़ंजर सारे

बशीर फ़ारूक़ी

मुझे ये डर है दिल-ए-ज़िंदा तू न मर जाए

कि ज़िंदगानी इबारत है तेरे जीने से

ख़्वाजा मीर दर्द

मौत की पहली अलामत साहिब

यही एहसास का मर जाना है

इदरीस बाबर

मैं उस के सामने से गुज़रता हूँ इस लिए

तर्क-ए-तअल्लुक़ात का एहसास मर न जाए

फ़ना निज़ामी कानपुरी

कैसी बिपता पाल रखी है क़ुर्बत की और दूरी की

ख़ुशबू मार रही है मुझ को अपनी ही कस्तूरी की

नईम सरमद

तन्हाई के लम्हात का एहसास हुआ है

जब तारों भरी रात का एहसास हुआ है

नसीम शाहजहाँपुरी

रेज़ा रेज़ा कर दिया जिस ने मिरे एहसास को

किस क़दर हैरान है वो मुझ को यकजा देख कर

ख़ुशबीर सिंह शाद

मिरे अंदर कई एहसास पत्थर हो रहे हैं

ये शीराज़ा बिखरना अब ज़रूरी हो गया है

ख़ुशबीर सिंह शाद

मुझ को एहसास-ए-रंग-ओ-बू न हुआ

यूँ भी अक्सर बहार आई है

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

हर तरफ़ अपने ही अपने हाए तन्हाई न पूछ

किस क़दर खलती है अक्सर हम को बीनाई न पूछ

अदील ज़ैदी

औरों की आग क्या तुझे कुंदन बनाएगी

अपनी भी आग में कभी चुप-चाप जल के देख

आबिदा करामत

हमें कम-बख़्त एहसास-ए-ख़ुदी उस दर पे ले बैठा

हम उठ जाते तो वो पर्दा भी उठ जाता जो हाइल था

नातिक़ गुलावठी

दुश्मन-ए-दिल ही नहीं दुश्मन-ए-जाँ होता है

उफ़ वो एहसास जो पीरी में जवाँ होता है

बशीर दुर्रानी

ग़म से एहसास का आईना जिला पाता है

और ग़म सीखे है आ कर ये सलीक़ा मुझ से

जावेद वशिष्ट

ये भी क्या कम है बसीरत की नज़र हासिल हुई

दोस्तों ने की जो तुझ से दुश्मनी मातम न कर

मुज़फ्फर अली सय्यद

लोग नाज़ुक थे और एहसास के वीराने तक

वो गुज़रते हुए आँखों की जलन से आए

रईस फ़रोग़

नज़र मिली भी न थी और उन को देख लय्या

ज़बाँ खुली भी न थी और बात भी कर ली

कैफ़ी आज़मी

जीने वाले पे क्या गुज़रती है

मरने वाला ये सोचता ही नहीं

शरजील अंसारी

हर कोई रह से हटा देता है ठोकर से 'वक़ी''

कितना दुश्वार है इक 'आम सा पत्थर होना

सय्यद मोहम्मद वक़ी

हम तो जैसे कि किनारे पे खड़े होते हैं

वो उदासी है कि बस बात मिले रोने को

ओसामा ज़ुरैज़

यूँ महसूस हुआ अपनी गहराई में जा कर

जैसे कोई मौज किनारे पर ले आई

मुज़फ़्फ़र वारसी

एक पत्थर नहीं तो फिर क्या है

दिल अगर ग़म से आश्ना न हुआ

एम अली

हम जैसों को बस इतनी इजाज़त है मिरे दोस्त

हम देख ही सकते हैं पसंद आया हुआ शख़्स

आमिर रहमती

शे'र कह के गुज़ार सकते हैं

ज़िंदगी हो या माँ का दिन 'काशिफ़'

काशिफ़ औरा

ख़ुदा हमारी समा'अत को जब रसाई दे

वो जो भी सोचे हमें दूर से सुनाई दे

अन्नू रिज़वी

मैं पी रहा हूँ तिरे रू-ब-रू सो ख़्वाहिश है

मैं चाहता हूँ न हो ख़त्म ये कभी चाय

सक़लैन मुश्ताक़

आज वो कुछ और भी अच्छा लगा

उस का चेहरा मुझ को आईना लगा

अन्नू रिज़वी

हँसते हँसते याद आया है

कोई कहीं पर रोता होगा

रघुनंदन शर्मा दानिश

किस ने तुम्हारे गाल को बोसों से भर दिया

किस ने कहे हैं शे'र हमारी ज़मीन पर

काशिफ़ औरा

काश हम महसूस करते दुख उन आँखों का कभी

देखती रहती हैं जो हर पल किसी का रास्ता

डॉ भावना श्रीवास्तव

अलम-बरदार तन्हाई था अपना 'फ़रहत-एहसास'

हुजूम-ए-शहर के हाथों जो मारा जा रहा है

फ़रहत एहसास

शिद्दत-ए-प्यास के एहसास को बढ़ने दीजे

एड़ियों से कभी चश्मे भी उबल सकते हैं

मुख़तार तलहरी

गिर गई क़ुर्ब की दीवार तो महसूस हुआ

मैं तिरा जिस्म नहीं था मैं तिरा साया था

दिवाकर राही

वो दिल बनाता है पत्थर पे इतनी ख़ूबी से

फिर उस के बा'द तो पत्थर धड़कने लगता है

शरजील अंसारी

ज़ियादा देर किनारे पे तुम खड़े न रहो

तुम्हारी आँखों में दरिया न डूब जाए कहीं

शरजील अंसारी

उस की तस्वीर थी मुक़द्दर में

मैं जिसे आँख करना चाहता था

काशिफ़ औरा

दिल वो मा'सूम कि हर शब को कहानी माँगे

'अक़्ल हर सुब्ह कहानी में मु'आफ़ी माँगे

आल-ए-अहमद सुरूर

'एहसास' ने बुतों में ख़ुदा को किया शरीक

इस शिर्क के बग़ैर तो ईमान ही नहीं

फ़रहत एहसास

उसे हुनर है निगाहों से बात करने का

मैं बे-ज़बान सा लगता हूँ ये ज़बान लिए

अन्नू रिज़वी

फिर गिरे हैं मिरे एहसास पे पत्थर के गुलाब

फिर मिरे ज़ेहन से रिसने लगा ख़ुशबू का लहू

मजाज़ आशना

नश्शा-ए-शौक़-ए-सफ़र टूटा तो एहसास हुआ

जिस जगह का हमें होना था वहीं के न रहे

मजाज़ आशना
बोलिए