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नातिक़ गुलावठी

1886 - 1969 | नागपुर, भारत

ग़ज़ल 45

शेर 110

किस को मेहरबाँ कहिए कौन मेहरबाँ अपना

वक़्त की ये बातें हैं वक़्त अब कहाँ अपना

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हिचकियों पर हो रहा है ज़िंदगी का राग ख़त्म

झटके दे कर तार तोड़े जा रहे हैं साज़ के

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हमारे ऐब में जिस से मदद मिले हम को

हमें है आज कल ऐसे किसी हुनर की तलाश

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ज़िंदगी जुनूँ सही बे-ख़ुदी सही

तू कुछ भी अपनी अक़्ल से पागल उठा तो ला

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हमें कम-बख़्त एहसास-ए-ख़ुदी उस दर पे ले बैठा

हम उठ जाते तो वो पर्दा भी उठ जाता जो हाइल था

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पुस्तकें 4

दीवान-ए-नातिक़

 

1976

Kaleel Mein Ghaleel

 

 

Kanz-ul-Matalib Sharh-e-Deewan-e-Ghalib

 

1968

Qirtas

Maulana Natiq Number : Shumara Number-005-008

2009

 

चित्र शायरी 1

कुछ नहीं अच्छा तो दुनिया में बुरा भी कुछ नहीं कीजिए सब कुछ मगर अपनी ज़रूरत देख कर

 

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