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अब्दुल हमीद अदम
ग़ज़ल 84
नज़्म 1
अशआर 109
दिल ख़ुश हुआ है मस्जिद-ए-वीराँ को देख कर
मेरी तरह ख़ुदा का भी ख़ाना ख़राब है
Rekhta
AI Explanation
इस शे’र में शायर ने ख़ुदा से मज़ाक़ किया है जो उर्दू ग़ज़ल की परंपरा रही है। शायर अल्लाह पर व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि तुम्हारे बंदों ने तुम्हारी इबादत करना छोड़ दी है जिसकी वजह से मस्जिद वीरान हो गई है। चूँकि तुमने मेरी क़िस्मत में ख़ाना-ख़राबी लिखी थी तो अब तुम्हारा उजड़ा हुआ घर देखकर मेरा दिल ख़ुश हुआ है।
शफ़क़ सुपुरी
कहते हैं उम्र-ए-रफ़्ता कभी लौटती नहीं
जा मय-कदे से मेरी जवानी उठा के ला
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क़ितआ 55
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मायूस हो गई है दुआ भी जबीन भी उठने लगा है दिल से ख़ुदा का यक़ीन भी तस्कीं की एक साँस हमें बख़्श दीजिए ये आसमाँ भी आप का और ये ज़मीन भी
वीडियो 26
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