संपूर्ण
परिचय
ग़ज़ल182
नज़्म1
शेर198
ई-पुस्तक75
टॉप 20 शायरी 20
चित्र शायरी 37
ऑडियो 45
वीडियो81
क़ितआ2
रुबाई6
क़िस्सा5
ब्लॉग5
अन्य
नअत1
दाग़ देहलवी
ग़ज़ल 182
नज़्म 1
अशआर 198
इस नहीं का कोई इलाज नहीं
रोज़ कहते हैं आप आज नहीं
Interpretation:
Rekhta AI
दाग़ देहलवी ने प्रेमी की बेबसी दिखायी है, जहाँ मिलने की बात हर दिन टाल दी जाती है। ‘आज नहीं’ सुनने में नरम लगता है, पर रोज़-रोज़ वही बात असल में साफ़ इनकार बन जाती है। इस लगातार टालने से चाह बढ़ती है और मन में लाचारी रह जाती है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
ईमान की तो ये है कि ईमान अब कहाँ
काफ़िर बना गई तिरी काफ़िर-नज़र मुझे
Interpretation:
Rekhta AI
कवि कहता है कि प्रेमिका की नज़र का असर इतना गहरा है कि उसके भीतर की आस्था और संयम टूट गए। “काफ़िर-नज़र” यहाँ ऐसी नज़र का संकेत है जो नियम-बंधन नहीं मानती और मन को बहका देती है। भाव यह है कि प्रेम और चाहत के सामने वह अपने विश्वास को हारता हुआ महसूस करता है, और इसी में व्यंग्य भी है।
जाओ भी क्या करोगे मेहर-ओ-वफ़ा
बार-हा आज़मा के देख लिया
Interpretation:
Rekhta AI
इस शे’र में बोलने वाला प्रिय के प्यार और वफ़ादारी के दावे को बेअसर बताता है। वह कहता है कि यह सब अब कोई फर्क नहीं डालता, क्योंकि इसे कई बार आज़माकर सच्चाई सामने आ चुकी है। भाव थका हुआ और उलाहने से भरा है, जैसे भरोसा खत्म हो गया हो। ‘बार-बार परखना’ इस बात का संकेत है कि अब उम्मीद नहीं बची।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
वो जाते हैं आती है क़यामत की सहर आज
रोता है दुआओं से गले मिल के असर आज
Interpretation:
Rekhta AI
प्रिय के चले जाने का दुख इतना बड़ा है कि कवि को लगता है जैसे आज का सवेरा भी विनाश का संकेत हो। दूसरी पंक्ति में “असर” को मानवीय रूप देकर कहा गया है कि दुआएँ इतनी दर्दभरी हैं कि उनकी शक्ति भी रो पड़ती है। भाव यह है कि जुदाई में इंसान केवल दुआ के सहारे रह जाता है, पर मन की बेबसी बनी रहती है।
होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
Interpretation:
Rekhta AI
यहाँ जीवन को एक यात्रा माना गया है और होश, सहन-शक्ति, ताकत को उस यात्रा का सामान। जब ये सब साथ नहीं रहते तो जीना आगे नहीं बढ़ पाता। इसलिए शायर कहता है कि अब विदा होने का समय आ गया, क्योंकि भीतर की पूँजी और सहारा छिन चुके हैं। भाव में दुख के साथ एक शांत स्वीकृति है।
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
क़ितआ 2
रुबाई 6
क़िस्सा 5
नअत 1
पुस्तकें 75
चित्र शायरी 37
तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था वो क़त्ल कर के मुझे हर किसी से पूछते हैं ये काम किस ने किया है ये काम किस का था वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था रहा न दिल में वो बेदर्द और दर्द रहा मुक़ीम कौन हुआ है मक़ाम किस का था न पूछ-गछ थी किसी की वहाँ न आव-भगत तुम्हारी बज़्म में कल एहतिमाम किस का था तमाम बज़्म जिसे सुन के रह गई मुश्ताक़ कहो वो तज़्किरा-ए-ना-तमाम किस का था हमारे ख़त के तो पुर्ज़े किए पढ़ा भी नहीं सुना जो तू ने ब-दिल वो पयाम किस का था उठाई क्यूँ न क़यामत अदू के कूचे में लिहाज़ आप को वक़्त-ए-ख़िराम किस का था गुज़र गया वो ज़माना कहूँ तो किस से कहूँ ख़याल दिल को मिरे सुब्ह ओ शाम किस का था हमें तो हज़रत-ए-वाइज़ की ज़िद ने पिलवाई यहाँ इरादा-ए-शर्ब-ए-मुदाम किस का था अगरचे देखने वाले तिरे हज़ारों थे तबाह-हाल बहुत ज़ेर-ए-बाम किस का था वो कौन था कि तुम्हें जिस ने बेवफ़ा जाना ख़याल-ए-ख़ाम ये सौदा-ए-ख़ाम किस का था इन्हीं सिफ़ात से होता है आदमी मशहूर जो लुत्फ़ आम वो करते ये नाम किस का था हर इक से कहते हैं क्या 'दाग़' बेवफ़ा निकला ये पूछे उन से कोई वो ग़ुलाम किस का था
लुत्फ़ वो इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी ऐसे उठाए हैं कि जी जानता है जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने तू ने दिल इतने सताए हैं कि जी जानता है तुम नहीं जानते अब तक ये तुम्हारे अंदाज़ वो मिरे दिल में समाए हैं कि जी जानता है इन्हीं क़दमों ने तुम्हारे इन्हीं क़दमों की क़सम ख़ाक में इतने मिलाए हैं कि जी जानता है दोस्ती में तिरी दर-पर्दा हमारे दुश्मन इस क़दर अपने पराए हैं कि जी जानता है