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दाग़ देहलवी

1831 - 1905 | दिल्ली, भारत

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

उर्दू के सबसे लोकप्रिय शायरों में शामिल। शायरी में चुस्ती , शोख़ी और मुहावरों के इस्तेमाल के लिए प्रसिद्ध

दाग़ देहलवी

ग़ज़ल 182

नज़्म 1

 

अशआर 198

इस नहीं का कोई इलाज नहीं

रोज़ कहते हैं आप आज नहीं

Interpretation: Rekhta AI

दाग़ देहलवी ने प्रेमी की बेबसी दिखायी है, जहाँ मिलने की बात हर दिन टाल दी जाती है। ‘आज नहीं’ सुनने में नरम लगता है, पर रोज़-रोज़ वही बात असल में साफ़ इनकार बन जाती है। इस लगातार टालने से चाह बढ़ती है और मन में लाचारी रह जाती है।

ईमान की तो ये है कि ईमान अब कहाँ

काफ़िर बना गई तिरी काफ़िर-नज़र मुझे

Interpretation: Rekhta AI

कवि कहता है कि प्रेमिका की नज़र का असर इतना गहरा है कि उसके भीतर की आस्था और संयम टूट गए। “काफ़िर-नज़र” यहाँ ऐसी नज़र का संकेत है जो नियम-बंधन नहीं मानती और मन को बहका देती है। भाव यह है कि प्रेम और चाहत के सामने वह अपने विश्वास को हारता हुआ महसूस करता है, और इसी में व्यंग्य भी है।

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जाओ भी क्या करोगे मेहर-ओ-वफ़ा

बार-हा आज़मा के देख लिया

Interpretation: Rekhta AI

इस शे’र में बोलने वाला प्रिय के प्यार और वफ़ादारी के दावे को बेअसर बताता है। वह कहता है कि यह सब अब कोई फर्क नहीं डालता, क्योंकि इसे कई बार आज़माकर सच्चाई सामने आ चुकी है। भाव थका हुआ और उलाहने से भरा है, जैसे भरोसा खत्म हो गया हो। ‘बार-बार परखना’ इस बात का संकेत है कि अब उम्मीद नहीं बची।

वो जाते हैं आती है क़यामत की सहर आज

रोता है दुआओं से गले मिल के असर आज

Interpretation: Rekhta AI

प्रिय के चले जाने का दुख इतना बड़ा है कि कवि को लगता है जैसे आज का सवेरा भी विनाश का संकेत हो। दूसरी पंक्ति में “असर” को मानवीय रूप देकर कहा गया है कि दुआएँ इतनी दर्दभरी हैं कि उनकी शक्ति भी रो पड़ती है। भाव यह है कि जुदाई में इंसान केवल दुआ के सहारे रह जाता है, पर मन की बेबसी बनी रहती है।

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होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके

अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया

Interpretation: Rekhta AI

यहाँ जीवन को एक यात्रा माना गया है और होश, सहन-शक्ति, ताकत को उस यात्रा का सामान। जब ये सब साथ नहीं रहते तो जीना आगे नहीं बढ़ पाता। इसलिए शायर कहता है कि अब विदा होने का समय आ गया, क्योंकि भीतर की पूँजी और सहारा छिन चुके हैं। भाव में दुख के साथ एक शांत स्वीकृति है।

क़ितआ 2

 

रुबाई 6

क़िस्सा 5

 

नअत 1

 

पुस्तकें 75

चित्र शायरी 37

वीडियो 81

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आप का ए'तिबार कौन करे

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इस क़दर नाज़ है क्यूँ आप को यकताई का

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